भगवान भास्कर की आराधना के इस महापर्व में आस्था के कई रूप देखने को मिलते है। इसी में भीख मांगकर भी छठ करने की परंपरा है।खरना आज

बिरौल/दरभंगा

आस्था व सूर्योपासना का महापर्व छठ की अपनी महिमा है। बुजुर्गों का कहना है कि छठी मैया की कृपा से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। असाध्य रोगों का नाश होता है, तो परिवार में सुख-शांति, समृद्धि आती है। महिमा जितनी महान, व्रत उतना ही कठिन। पवित्रता, त्याग व हठ योग की भांति तपस्या लेकिन मनोवांछित फल देने में भगवान दीनानाथ भी निराश नहीं करते हैं। छठ मैया से मनौती मांगी जाती है तथा मनौती पूर्ण होने पर मैया की मनौती मांगते वक्त किए गए वादे के अनुरूप ही छठ पूजा की जाती है। परिणामत: भगवान भास्कर की आराधना के इस महापर्व में आस्था के कई रूप देखने को मिलते है।

इसी में भीख मांगकर भी छठ करने की परंपरा है।बुजुर्गों का कहना है कि मैया की कृपा से परिवार की सलामती के लिए महिलाएं खुद या फिर अपने संतान से भीख मंगवाती है तथा इसमें मिले अन्न व पैसे से छठी मैया की श्रद्धा भाव से आराधना करती है। यही वजह है कि नहाय खाय के दिन से ही बड़ी संख्या में लोग अपने गांव पड़ोस में भीख मांगने निकलते हैं। क्या अमीर, क्या गरीब सब मिलकर सूर्योपासना के इस महापर्व में हाथ बंटाते हैं। भीख मांगकर छठ करने की परंपरा का आध्यात्मिक व मनोवैज्ञानिक आधार है। ऐसी परंपरा से व्यक्ति का अहं दूर हो जाता है। मन निर्मल निश्चल हो जाता है व समरस समाज का निर्माण होता है। सोनपुर  निवासी राजेंद्र राय बताते हैं कि भगवान से मांगने के पहले लोग भीख मांगकर मन को उस अनुरूप ढालते हैं लेकिन यह दिखावे के तौर पर नहीं, बल्कि मन से हो।

जो इंसान मन से दीन हो जाता है और लगता है कि कोई उसका सहारा नहीं तो भगवान स्वयं उसका सहारा बन जाते हैं। यह पर्व महज सूर्य उपासना व जल अर्पण का नहीं है, इसे अनुशासित व संयमित जीवन सादगी व स्वच्छता सहित प्रकृति के प्रति समर्पण का भी पर्व कहा जाता है।