UGC-CARE सूची खत्म, फिर भी पुरानी शर्त पर अटके शोधार्थी,

दीपक झा ने कुलपति को सौंपा आवेदन, नए नियमों के अनुरूप स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग

दस्तक 7मीडिया /दरभंगा 

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधार्थियों के शोध-पत्र प्रकाशन को लेकर नियमों की अलग-अलग व्याख्या का मामला सामने आया है। वरिष्ठ छात्र नेता एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के पूर्व परिषद सदस्य दीपक झा ने कुलपति को आवेदन देकर समाप्त हो चुकी UGC-CARE सूची की पुरानी व्यवस्था को शोधार्थियों पर लागू किए जाने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने विश्वविद्यालय से वर्तमान UGC व्यवस्था के अनुरूप स्पष्ट एवं समान दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।

दीपक झा ने अपने आवेदन में कहा है कि विश्वविद्यालय के कई शोधार्थियों को पूर्व-प्रस्तुतीकरण और शोध-प्रबंध जमा करने की प्रक्रिया में पुराने UGC-CARE सूचीबद्ध जर्नल में शोध-पत्र प्रकाशित करने की अनिवार्यता के कारण परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि जब UGC ने 16 जुलाई 2025 को सार्वजनिक सूचना जारी कर UGC-CARE सूची से संबंधित पूर्व व्यवस्था को समाप्त कर नई व्यवस्था की ओर बढ़ने की बात कही है, तो समाप्त हो चुकी सूची के आधार पर शोधार्थियों की अकादमिक प्रक्रिया को बाधित करना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि बिहार राजभवन से संबंधित पीएचडी अध्यादेश एवं विनियमों में शोध-प्रबंध जमा करने से पहले शोध-पत्र के संदर्भित, समकक्ष-समीक्षित अथवा अनुमोदित शोध-पत्रिका में प्रकाशन का प्रावधान है। इसे केवल पुरानी UGC-CARE सूची तक सीमित करना शोधार्थियों के लिए अनावश्यक कठिनाई पैदा कर सकता है।

2023 के दिशा-निर्देशों की समीक्षा की मांग

दीपक झा ने वर्ष 2023 में जारी पीएचडी शोधार्थी दिशा-निर्देशों में UGC-CARE सूची से जुड़े प्रावधानों की तत्काल समीक्षा करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय को UGC की नवीन व्यवस्था के अनुरूप संशोधित और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करना चाहिए, ताकि गुणवत्तापूर्ण एवं समकक्ष-समीक्षित शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध-पत्रों को निर्धारित अकादमिक मानकों के आधार पर स्वीकार किया जा सके।

उन्होंने यह भी मांग की कि केवल पुरानी UGC-CARE सूची में शोध-पत्र प्रकाशित नहीं होने के आधार पर किसी शोधार्थी का पूर्व-प्रस्तुतीकरण, शोध-प्रबंध जमा करने की प्रक्रिया या संबंधित फाइल लंबित नहीं रखी जाए। पहले से शोधकार्य और अन्य अकादमिक औपचारिकताएं पूरी कर चुके शोधार्थियों के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था लागू करने की भी मांग की गई है।

दीपक झा ने कहा कि विश्वविद्यालय जैसी उच्च शैक्षणिक संस्था में नियम स्पष्ट, समान और पारदर्शी होने चाहिए। अलग-अलग विभागों में नियमों की अलग व्याख्या या समाप्त हो चुकी व्यवस्था के कारण शोधार्थियों की पीएचडी उपाधि प्राप्ति में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से शीघ्र निर्णय लेकर सभी स्नातकोत्तर विभागों में एक समान व्यवस्था लागू करने की मांग की है।