महिला थाना में फरियादियों की अनदेखी, आखिर कैसे मिलेगा महिलाओं को न्याय? थानाध्यक्ष गायब, ओडी पदाधिकारी का इंतजार करती रहीं महिलाएं; सिमरी की रेणु के मामले ने महिला थाना की कार्यशैली पर खड़े किए गंभीर सवाल ?
महिला थाना में फरियादियों की अनदेखी, आखिर कैसे मिलेगा महिलाओं को न्याय? थानाध्यक्ष गायब, ओडी पदाधिकारी का इंतजार करती रहीं महिलाएं; सिमरी की रेणु के मामले ने महिला थाना की कार्यशैली पर खड़े किए गंभीर सवाल ?
महिला थाना में फरियादियों की अनदेखी, आखिर कैसे मिलेगा महिलाओं को न्याय?
थानाध्यक्ष गायब, ओडी पदाधिकारी का इंतजार करती रहीं महिलाएं; सिमरी की रेणु के मामले ने महिला थाना की कार्यशैली पर खड़े किए गंभीर सवाल
दस्तक 7मीडिया /दरभंगा
महिलाओं को त्वरित न्याय और सुरक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित महिला थाना ही अगर फरियाद लेकर पहुंचने वाली महिलाओं को घंटों इंतजार कराने लगे और उनकी शिकायत को लेकर गंभीरता न दिखाई जाए तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।
इन दिनों महिला थाना में न्याय की आस लेकर पहुंचने वाली कई महिलाएं पुलिस की कार्यशैली से परेशान होकर लौट रही हैं। कई मौकों पर थानाध्यक्ष के थाने में मौजूद नहीं रहने और ओडी पदाधिकारी के आसानी से उपलब्ध नहीं होने की शिकायत सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस तरह कैसे चलेगा महिला थाना और कैसे मिलेगा पीड़ित महिलाओं को न्याय?
एक ओर वरीय पुलिस अधीक्षक आम लोगों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हे और पीड़ितों को न्याय देने के लिए लगातार सक्रिय नजर आते हैं, वहीं दूसरी ओर महिला थाना की कार्यशैली को लेकर शिकायतें सामने आना पुलिस महकमे के लिए गंभीर विषय है।
सिमरी की रेणु के मामले ने खड़े किए सवाल
सिमरी थाना क्षेत्र की रहने वाली रेणु कुमारी अपने साथ कथित जबरदस्ती के मामले में न्याय की गुहार लेकर महिला थाना पहुंची थी। बताया जाता है कि उसके आवेदन में थाना के नाम के रूप में सिमरी थाना अंकित था। यदि मामला महिला थाना के अधिकार क्षेत्र में आता था तो महिला थाना के पुलिस पदाधिकारी आवेदन में आवश्यक सुधार कर सकते थे अथवा पीड़िता से दूसरा आवेदन लिखवा सकते थे। लेकिन आरोप है कि ऐसा नहीं किया गया और रेणु को वापस लौटना पड़ा।थाना के सीसीटीवी फुटेज में भी देखा जा सकता हे।
रेणु का आवेदन
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब स्थिति यह है कि रेणु प्राथमिकी दर्ज कराने से ही पीछे हट गई है। इससे यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर एक पीड़ित महिला को पुलिस तक पहुंचने के बाद भी न्याय की प्रक्रिया से पीछे हटने की नौबत क्यों आई?
क्या पीड़िता को मुकदमे से डराया गया?
सूत्रों के अनुसार, महिला थाना के किसी कर्मी द्वारा रेणु को फोन कर कथित तौर पर यह समझाने का प्रयास किया गया कि वह गुजरात में अपने पति के साथ रहती है, कमाती-खाती है और यदि मुकदमे में फंस गई तो लगातार तारीखों के कारण उसका परिवार परेशान हो जाएगा। हालांकि इस कथित बातचीत की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।लेकिन कॉल डिटेल्स से पता लगाया जा सकता हे ?
जब इस संबंध में रेणु से बात की गई तो उसने भी आर्थिक परेशानी का हवाला देते हुए मुकदमे में पड़ने से बचने की बात कही। यदि किसी पीड़ित महिला को पुलिस थाने से ही मुकदमे की जटिलताओं का डर दिखने लगे, तो यह महिला सुरक्षा और न्याय की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
महिला थानाध्यक्ष ने भी मामले से पल्ला झाड़ा
इस संबंध में महिला थानाध्यक्ष से जब पूछा गया तो उनका कहना था कि मामला सिमरी थाना का है। सवाल यह है कि यदि मामला वास्तव में सिमरी थाना का था तो महिला थाना पहुंची ,पीड़िता को उचित प्रक्रिया समझाकर संबंधित थाने तक भेजने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या पीड़िता को केवल इसलिए लौटा देना उचित था कि उसके आवेदन पर सिमरी थाना लिखा हुआ था?
महिला थाना का उद्देश्य ही ऐसी महिलाओं को सुरक्षित और सहज माहौल उपलब्ध कराना है, जो घरेलू हिंसा, जबरदस्ती, उत्पीड़न या अन्य गंभीर मामलों में पुलिस के पास न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचती हैं। ऐसे में छोटी-छोटी प्रक्रियात्मक खामियों के कारण यदि पीड़िता थाने से निराश होकर लौट जाए तो महिला थाना की स्थापना का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।
बहेड़ा और भालपट्टी से भी पहुंचीं फरियादी
इसी दौरान बहेड़ा थाना क्षेत्र की हेमा खातून और भालपट्टी थाना क्षेत्र की जहांआरा भी अपनी फरियाद लेकर महिला थाना पहुंचीं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि इन फरियादियों की शिकायतों पर कितनी तत्परता से सुनवाई हुई और उन्हें किस स्तर पर न्याय दिलाने की कार्रवाई की गई।मजेदार बात यह हे कि दिन में ओडी पदाधिकारी समेत अन्य भी गायब थे।
वरीय अधिकारियों को लेनी होगी संज्ञान
महिला थाना महिलाओं के लिए पुलिस व्यवस्था का वह स्थान है जहां एक पीड़िता को सबसे पहले भरोसा और सुरक्षा का एहसास होना चाहिए। यदि वहां पहुंचने के बाद उसे पदाधिकारी का इंतजार करना पड़े, आवेदन को लेकर उलझाया जाए या मुकदमे की प्रक्रिया से भयभीत होकर लौटना पड़े, तो यह केवल एक महिला की समस्या नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवाल है।
महिला थाना में इंतजार करते हेमा खातून ,जहांआरा और रेणु कुमारी
अब देखना यह है कि वरीय पुलिस अधिकारी महिला थाना की कार्यशैली की समीक्षा कर फरियादियों को तत्काल सुनवाई, आवेदन लेने और उचित कार्रवाई की व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं या नहीं। क्योंकि सवाल सिर्फ रेणु का नहीं है ,सवाल उन तमाम महिलाओं का है जो आखिरी उम्मीद लेकर महिला थाना पहुंचती हैं और वहां से भी निराश होकर लौटती हैं।
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