दरभंगा के तात्कालीन/सेवानिवृत इंस्पेक्टर अवधेश कुमार झा की पुत्री आईएएस बनकर बढ़ाया बिहार का मान, राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होकर रचा गौरवशाली अध्याय 

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय 

सीतामढ़ी जिले के छोटे से गांव भटौलिया की बेटी शोभा कुमारी ने अपनी प्रतिभा, मेहनत और सेवाभाव से पूरे जिले का नाम रोशन किया है। संघ लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठित परीक्षा पास कर भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित शोभा कुमारी इन दिनों मसूरी स्थित प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। प्रशिक्षण के दौरान उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किए जाने का गौरव प्राप्त हुआ है।

अवधेश कुमार झा 

शोभा कुमारी अवधेश कुमार झा की पुत्री हैं और ग्राम भटौलिया, पोस्ट पताही, थाना बेलसंड, जिला सीतामढ़ी, बिहार की रहने वाली हैं। वह ओटीओ 0473, बैच 2025-26 की प्रशिक्षु अधिकारी हैं। उनकी उपलब्धि ने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे सीतामढ़ी और बिहार को गौरवान्वित किया है।

अधिकारी बनने से पहले ही सेवा का जज्बा

शोभा की खासियत सिर्फ उनकी प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उनके समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशील रवैया भी है। प्रशिक्षण के दौरान भी जब उन्हें समय मिलता है, तों वह गरीब और असहाय लोगों की मदद करने के लिए आगे रहती हैं। जरूरतमंदों को खोज-खोजकर भोजन उपलब्ध कराना उनके सेवाभाव का हिस्सा बन गया है।

परिवार और परिचितों के अनुसार, शोभा बचपन से ही सामाजिक और नेक कार्यों के प्रति रुचि रखती रही हैं। आईएएस बनने के बाद भी उन्होंने अपनी जड़ों और समाज के जरूरतमंद लोगों को नहीं भुलाया। यही संवेदनशीलता उन्हें एक सफल अधिकारी के साथ-साथ एक बेहतर इंसान बनने की दिशा में भी आगे बढ़ा रही है।

गांव की बेटी से आईएएस तक का सफर

भटौलिया जैसे ग्रामीण परिवेश से निकलकर देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवाओं में स्थान बनाना अपने आप में प्रेरणादायक उपलब्धि है। शोभा कुमारी की सफलता आज गांव के उन तमाम युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।

राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने के बाद से  ही शोभा के परिवार और गांव में खुशी का माहौल है। लोगों का कहना है कि भटौलिया गांव की बेटी ने अपनी मेहनत से सीतामढ़ी का मान बढ़ाया है और अब सेवा एवं संवेदनशीलता के जरिए समाज के लिए मिसाल कायम कर रही हैं।शोभा कुमारी की कहानी सिर्फ आईएएस बनने की कहानी नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि सफलता की असली पहचान तब होती है, जब ऊंचे पद पर पहुंचने के बाद भी इंसान अपने भीतर का सेवाभाव जिंदा रखे।