बिहार में शराबबंदी पर NCAER की रिपोर्ट, नीति वापस लेने की सिफारिश
बिहार में शराबबंदी पर NCAER की रिपोर्ट, नीति वापस लेने की सिफारिश
बिहार में शराबबंदी पर NCAER की रिपोर्ट, नीति वापस लेने की सिफारिश
दस्तक 7मीडिया /नई दिल्ली।
बिहार में वर्ष 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी को लेकर नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के एक नए शोध पत्र ने बहस तेज कर दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शराबबंदी अपने प्रमुख सामाजिक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सकी और इसके आर्थिक तथा प्रशासनिक दुष्प्रभाव सामने आए हैं। शोध पत्र को दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया पॉलिसी फोरम’ के दौरान प्रस्तुत किया गया।
महिलाओं के खिलाफ अपराध पर सवाल: रिपोर्ट में 2012 से 2024 तक के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि शराबबंदी के बाद बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं आई। हालांकि, दूसरे शोध इसके विपरीत निष्कर्ष भी देते हैं 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा में कमी के प्रमाण मिले हैं।
राजस्व का बड़ा नुकसान: रिपोर्ट के अनुसार शराबबंदी से पहले शराब से मिलने वाला आबकारी राजस्व बिहार के अपने राजस्व में करीब 14-15 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता था। पूर्ण प्रतिबंध के बाद यह स्रोत बंद हो गया। NCAER का तर्क है कि इस कारण विकास और पूंजीगत खर्च के लिए राज्य पर अन्य वित्तीय स्रोतों पर निर्भरता बढ़ी है।
प्रवर्तन पर बढ़ा खर्च
शराबबंदी लागू रखने के लिए पुलिस, निगरानी, जांच और तस्करी रोकने के अभियान पर सरकारी संसाधनों की बड़ी मात्रा खर्च हो रही है। रिपोर्ट का कहना है कि राजस्व की कमी और प्रवर्तन लागत ने राज्य के वित्तीय दबाव को बढ़ाया है।
अवैध शराब और नशे का नेटवर्क: शोध पत्र में यह भी कहा गया है कि कानूनी शराब की उपलब्धता बंद होने के बाद अवैध शराब और दूसरे नशीले पदार्थों की ओर खपत का स्थानांतरण हुआ है। हालांकि, इस दावे के कुछ हिस्से को रिपोर्ट में व्यावहारिक/जमीनी साक्ष्यों पर आधारित बताया गया है, इसलिए इसे निर्णायक कारण-परिणाम के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
NCAER की प्रमुख सिफारिशें
शराबबंदी खत्म करने पर विचार किया जाए और शराब से मिलने वाले राजस्व को बहाल किया जाए।
शराबबंदी पर खर्च होने वाले प्रशासनिक और प्रवर्तन संसाधनों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बाढ़ नियंत्रण और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में लगाया जाए।
राज्य के विकास और पूंजीगत व्यय के लिए अतिरिक्त राजस्व संसाधन तैयार किए जाएं।
बिहार सरकार की आधिकारिक जानकारी के अनुसार पूर्ण शराबबंदी 5 अप्रैल 2016 को घोषित की गई थी और वर्तमान कानून का उद्देश्य राज्य में शराब एवं मादक पदार्थों के पूर्ण निषेध को लागू करना है।
ध्यान देने योग्य बात यह हे कि शराबबंदी के प्रभाव पर उपलब्ध अकादमिक शोध एकमत नहीं हैं। उदाहरण के लिए, एक अध्ययन में शराब सेवन में उल्लेखनीय गिरावट पाई गई, जबकि दूसरे में घरेलू हिंसा में कमी के प्रमाण मिले। वहीं एक अन्य अध्ययन ने लंबे समय में वैकल्पिक नशीले पदार्थों की खपत में बदलाव की ओर संकेत किया है।