व्यवहार न्यायालय में फर्जी एमटीएस बनकर ले रहे थे प्रशिक्षण, एपीपी समेत तीन गिरफ्तार; बड़े गिरोह की आशंका
दस्तक 7 मीडिया ,दरभंगा/ विधि संवाददाता दरभंगा
दरभंगा व्यवहार न्यायालय की सुरक्षा व्यवस्था और नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। फर्जी पहचान पत्र के सहारे खुद को मल्टी टास्किंग स्टाफ (एमटीएस) बताकर लंबे समय से न्यायालय में प्रशिक्षण ले रहे दो युवकों को लहेरियासराय थाना पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मामले में प्रशिक्षण देने वाले अपर लोक अभियोजक (एपीपी) अशोक कुमार को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने तीनों को न्यायिक हिरासत में भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
पुलिस ने इस मामले में एपीपी सहित सात नामजद और फर्जी पहचान पत्र तैयार करने वाले अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर व्यापक जांच शुरू कर दी है। पुलिस को आशंका है कि इस पूरे मामले के पीछे नौकरी दिलाने के नाम पर सक्रिय एक संगठित गिरोह काम कर रहा है।
पुलिस के अनुसार, 3 अगस्त की दोपहर सूचना मिली थी कि दो व्यक्ति फर्जी आई-कार्ड के सहारे व्यवहार न्यायालय परिसर में मौजूद हैं और पिछले कुछ समय से अदालत में प्रशिक्षण भी ले रहे हैं। सूचना मिलते ही लहेरियासराय थाना पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ की। जांच के दौरान पता चला कि दोनों एक एपीपी से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे।
गिरफ्तार युवकों की पहचान विकास कुमार यादव और मनोज कुमार के रूप में हुई है। दोनों के गले में सिविल कोर्ट, दरभंगा के नाम से जारी कथित पहचान पत्र लटका हुआ था। प्रारंभिक जांच में आई-कार्ड पर अंकित जारीकर्ता का पद, मुहर और हस्ताक्षर संदिग्ध पाए गए।
पूछताछ में दोनों युवकों ने पुलिस को बताया कि नौकरी दिलाने के नाम पर उनकी पहचान देव, नईमुद्दीन तथा अजय उर्फ अमन से हुई थी। आरोप है कि इन्हीं लोगों ने फर्जी आई-कार्ड उपलब्ध कराया और व्यवहार न्यायालय में एमटीएस के रूप में प्रशिक्षण लेने की व्यवस्था कराई।
पुलिस के मुताबिक, दोनों युवकों ने यह भी स्वीकार किया कि वे 23 जून 2024 से व्यवहार न्यायालय के विभिन्न न्यायालयों में एमटीएस के रूप में प्रशिक्षण ले रहे थे। पूछताछ के दौरान एपीपी अशोक कुमार ने पुलिस को बताया कि उन्हें एक व्यक्ति के फोन पर अदालत की कार्यप्रणाली और दस्तावेजों से संबंधित प्रशिक्षण देने के लिए कहा गया था। हालांकि, बिना किसी सत्यापन के प्रशिक्षण शुरू कर देना पुलिस ने गंभीर लापरवाही माना और उन्हें भी मामले में गिरफ्तार कर लिया।
जांच के दौरान पुलिस ने नियुक्ति पत्र, ज्वाइनिंग लेटर अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी कोई वैध दस्तावेज मांगा, लेकिन आरोपित कोई भी अधिकृत कागजात प्रस्तुत नहीं कर सके।
इसके बाद कोर्ट प्रशासन एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डीएलएसए) कार्यालय से सत्यापन कराया गया। जांच में स्पष्ट हुआ कि संबंधित पहचान पत्र न्यायालय की ओर से कभी जारी ही नहीं किए गए थे। इतना ही नहीं, आई-कार्ड पर अंकित जारीकर्ता का पद भी न्यायालय में अस्तित्व में नहीं है। पुलिस को आशंका है कि डीएलएसए सचिव के हस्ताक्षर स्कैन कर फर्जी पहचान पत्र तैयार किए गए।
पुलिस ने दोनों आरोपितों के कब्जे से कथित फर्जी आई-कार्ड और मोबाइल फोन जब्त कर लिए हैं। मामले में गिरफ्तार दोनों युवकों के अलावा एपीपी अशोक कुमार, देव, नईमुद्दीन, अजय उर्फ अमन, फर्जी आई-कार्ड तैयार करने वाले दुकानदार तथा अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ बीएनएस की विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई है।
पुलिस का मानना है कि मामला केवल फर्जी पहचान पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायालय की सुरक्षा, गोपनीय दस्तावेजों तक पहुंच और नौकरी दिलाने के नाम पर सक्रिय किसी बड़े गिरोह से भी जुड़ा हो सकता है। लहेरियासराय थाना पुलिस पूरे नेटवर्क का पता लगाने के लिए तकनीकी एवं अन्य साक्ष्यों के आधार पर गहन अनुसंधान कर रही है। पुलिस का कहना है कि तीनों आरोपितों को न्यायिक हिरासत में भेजा जा रहा है तथा मामले की जांच जारी है।