बांकीपुर का किला ढहा: 35 साल बाद भाजपा पर सबसे बड़ा राजनीतिक प्रहार, प्रशांत किशोर की रणनीति ने बदली बिहार की सियासत

दस्तक 7मीडिया /पटना 

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट का फैसला नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में बदलते जनमत का बड़ा संकेत माना जा रहा है। करीब 35 वर्षों से भाजपा का मजबूत गढ़ रहे बांकीपुर में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने ऐसी चुनावी रणनीति अपनाई कि भाजपा को अपने सबसे सुरक्षित माने जाने वाले किले में करारी हार का सामना करना पड़ा।

मतगणना के 31वें राउंड तक जन सुराज के प्रत्याशी प्रशांत किशोर को 63,203 वोट मिले, जबकि भाजपा के नीरज कुमार 44,250 वोट पर सिमट गए। दोनों के बीच 18,953 मतों का बड़ा अंतर रहा। वहीं राजद प्रत्याशी को 14,085 वोट मिले और वे जन सुराज से 49,118 मतों से पीछे रहे। इन आंकड़ों ने साफ कर दिया कि मुकाबला भाजपा और जन सुराज के बीच केंद्रित हो गया था।32वें राउंड यानि आखिरी राउंड में भाजपा के वोटों से 19246वोटों से प्रशांत ने बढ़त बनाई और चुनाव आयोग ने भी प्रशांत के माथे जीत लिख दिया।

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के एक नेता का कथित बयान“भाजपा बांकीपुर से कुत्ता-बिल्ली को भी टिकट दे दे तो वह जीत जाएगा”चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। प्रशांत किशोर ने इस बयान को लगातार जनसभाओं और प्रचार अभियान में उठाया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बयान ने मतदाताओं के बीच यह संदेश दिया कि भाजपा अपने पारंपरिक वोट बैंक और जनता को हल्के में ले रही है। यही मुद्दा चुनाव के अंतिम चरण तक भाजपा पर भारी पड़ता दिखा।

चुनाव के दौरान भाजपा के उम्मीदवार चयन पर भी सवाल उठे। विपक्ष ने इसे भाजपा के अहंकार और अति-आत्मविश्वास का उदाहरण बताते हुए जनता के बीच जोरदार तरीके से प्रचारित किया। वहीं जन सुराज ने स्थानीय मुद्दों, संगठन और लगातार जनसंपर्क के सहारे चुनाव को भाजपा बनाम जनता की लड़ाई का स्वरूप देने की कोशिश की।

बांकीपुर की यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि यह सीट लंबे समय से भाजपा का अभेद्य गढ़ रही है। इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व पहले नितिन नवीन और उनके परिवार के पास रहा है। ऐसे में इस किले का ढहना केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस उपचुनाव में मतदाताओं ने पारंपरिक जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर मतदान किया। विभिन्न सामाजिक वर्गों का समर्थन जन सुराज के पक्ष में जाता दिखाई दिया, जिससे यह संदेश भी निकला कि अब केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय मुद्दे और चुनावी रणनीति भी निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि एक उपचुनाव के नतीजे से पूरे बिहार की राजनीति का भविष्य तय नहीं माना जा सकता। राज्य सरकार की स्थिरता पर इस परिणाम का कोई तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यह परिणाम भाजपा-जदयू गठबंधन और विपक्ष दोनों के लिए गंभीर राजनीतिक संदेश जरूर छोड़ गया है।

बांकीपुर का किला ढह चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या यह सिर्फ एक उपचुनाव की कहानी है, या फिर बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव की शुरुआत?एक तरफ जश्न हे वहीं दूसरी और भाजपा कार्यालय में सन्नाटा।प्रशांत किशोर ने जिस तरह अपनी बातों को रखा यह भी भाजपा के लिये नसीहत हे ,लोकतंत्र में तानाशाह बनना ,अहंकार पालना भी खतरे की घंटी हे ?