“बार काउंसिल को न्यास बनाने का अधिकार नहीं, पहले हो स्वतंत्र जांच” अधिवक्ता संशोधन विधेयक-2026 के प्रावधान पर अधिवक्ता कल्याण समिति का तीखा विरोध
“बार काउंसिल को न्यास बनाने का अधिकार नहीं, पहले हो स्वतंत्र जांच” अधिवक्ता संशोधन विधेयक-2026 के प्रावधान पर अधिवक्ता कल्याण समिति का तीखा विरोध
“बार काउंसिल को न्यास बनाने का अधिकार नहीं, पहले हो स्वतंत्र जांच”
अधिवक्ता संशोधन विधेयक-2026 के प्रावधान पर अधिवक्ता कल्याण समिति का तीखा विरोध
दस्तक 7मीडिया /विधि संवाददाता
केंद्र सरकार के प्रस्तावित अधिवक्ता (संशोधन) विधेयक, 2026 को लेकर अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण समिति (युवा प्रकोष्ठ) ने बड़ा सवाल उठाया है। समिति ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) और राज्य बार परिषदों को न्यास (ट्रस्ट) गठित करने का अधिकार देने वाले प्रावधान का कड़ा विरोध करते हुए मांग की है कि इससे जुड़े सभी मामलों की स्वतंत्र जांच होने तक इस प्रावधान को लागू नहीं किया जाए।
समिति के राष्ट्रीय महामंत्री सुशील कुमार चौधरी ने शुक्रवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अनुसार बार परिषदों की जिम्मेदारी अधिवक्ताओं के कल्याण, अनुशासन और विधिक शिक्षा के नियमन तक सीमित है। न्यास का गठन और संचालन उनके मूल दायित्वों में शामिल नहीं है। ऐसे प्रावधान वैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग का कारण बन सकते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि बीसीआई द्वारा गठित ‘पर्ल फर्स्ट’ न्यास के गठन के बाद अधिवक्ताओं एवं विधि महाविद्यालयों से प्राप्त धनराशि के उपयोग का आज तक कोई सार्वजनिक लेखा-जोखा नहीं दिया गया। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि किन संस्थानों को आर्थिक सहायता प्रदान की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बीसीआई के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों पर विधि महाविद्यालयों से दान के लिए दबाव बनाने तथा उच्च न्यायपालिका के नाम का दुरुपयोग करने जैसे गंभीर आरोप लग चुके हैं। इसके अलावा गोवा स्थित भारतीय अंतर्राष्ट्रीय विधिक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय में नियुक्तियों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए।
समिति ने मांग की कि ‘पर्ल फर्स्ट’ न्यास और उक्त विश्वविद्यालय के वित्तीय लेन-देन, प्रशासनिक कार्यों एवं नियुक्तियों की किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जाए। जांच रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत होने तक विधेयक में न्यास संबंधी प्रावधानों को हटाया जाए या स्थगित रखा जाए।
सुशील कुमार चौधरी ने कहा कि अधिवक्ताओं से प्राप्त निधियों की सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना ऐसे प्रावधानों को कानूनी मान्यता देना अधिवक्ता समुदाय के हितों के खिलाफ होगा। उन्होंने देशभर के अधिवक्ताओं और विधि छात्रों से इस मुद्दे पर एकजुट होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाने की अपील की।
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