स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल: दरभंगा के अनुमंडल अस्पताल में तीन महीने से ठप है मरीजों का भोजन और नाश्ता

दस्तक 7 मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा।


सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य लाभ, मुफ्त दवा और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे कागजों तक ही सिमटकर रह गए हैं। दरभंगा जिले के बिरौल अनुमंडल अस्पताल से एक बेहद ही संवेदनशील और लचर व्यवस्था की तस्वीर सामने आई है, जहां विगत तीन महीनों से मरीजों को न भोजन मिल रहा है और न ही सुबह का नाश्ता। स्वास्थ्य विभाग के इन दावों की पोल खुलने से गरीब मरीजों और उनके परिजनों पर दोहरी मार पड़ रही है।
नियमानुसार सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने वाले हर मरीज को स्वास्थ्य विभाग की ओर से मुफ्त एवं पौष्टिक भोजन और नाश्ता मुहैया कराया जाना अनिवार्य है, ताकि इलाज के दौरान मरीज की रिकवरी तेजी से हो सके। लेकिन दरभंगा के इस अनुमंडल अस्पताल में यह व्यवस्था पूरी तरह फेल साबित हो चुकी है। हालात यह हैं कि पिछले तीन महीनों से अस्पताल प्रशासन की उदासीनता के कारण मरीजों के थाली तक निवाला पहुंचना तो दूर, चाय-बिस्कुट तक नसीब नहीं हो रहा है।
जब दस्तक 7 मीडिया की टीम ने जमीनी हकीकत जानने के लिए अनुमंडल अस्पताल का दौरा किया, तो वहां भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों का गुस्सा और लाचारी खुलकर सामने आई।
अस्पताल में मौजूद कई मरीजों के परिजनों ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए सिस्टम की पोल खोली।
सुलेखा देवी (मरीज) के परिजन) ने बताया कि, अस्पताल में मरीजों को खाने-पीने की सुविधा देने की बात सिर्फ कही जाती है, लेकिन हकीकत में पिछले तीन महीने से यहां कुछ नहीं मिल रहा। गरीब मरीज बाहर से खाना मंगाने को मजबूर हैं। सुचिता देवी ने रोष जताते हुए कहा,जब अस्पताल में भर्ती मरीज को दो वक्त का भोजन ही नहीं मिलेगा, तो वह जल्दी स्वस्थ कैसे होगा? हमें बाहर होटलों से महंगे दामों पर खाना खरीदना पड़ रहा है।
उर्मिला देवी के अनुसार,भोजन की बात तो दूर, सुबह के वक्त मिलने वाला नाश्ता भी विभाग की ओर से पूरी तरह बंद है। पूछने वाला कोई नहीं है कि मरीज कैसे पेट भर रहे हैं। सोनू खातून और ज्योति कुमारी ने भी इस लचर व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि अस्पताल प्रशासन की इस लापरवाही के कारण गरीब परिवारों की जेब पर भारी डाका पड़ रहा है।
मरीजों को समय पर भोजन और नाश्ता नहीं मिलने के कारण उनके परिजनों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में इलाज कराने पहुंचे अधिकांश लोग गरीब और मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में, तीन महीने से लगातार बाहर से भोजन मंगवाने के कारण उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इस गंभीर अनियमितता की जानकारी के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के लोग चुप्पी क्यों साधे बैठे हैं? क्या अस्पताल प्रबंधन मरीजों के हक के बजट में लीपापोती कर रहा है?
स्थानीय लोगों और पीड़ित परिजनों ने जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही, मरीजों के भोजन और नाश्ते की व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से सुचारू किया जाए ताकि अस्पताल में आने वाले गरीबों को इस अमानवीय लापरवाही से राहत मिल सके।