बिहार में शिक्षा क्रांति का नया अध्याय, सरस्वती विद्या निकेतन का शुभारंभ, पर बीईओ के रिक्त पदों पर टिकी हैं निगाहें
बिहार में शिक्षा क्रांति का नया अध्याय, सरस्वती विद्या निकेतन का शुभारंभ, पर बीईओ के रिक्त पदों पर टिकी हैं निगाहें
बिहार में शिक्षा क्रांति का नया अध्याय, सरस्वती विद्या निकेतन का शुभारंभ, पर बीईओ के रिक्त पदों पर टिकी हैं निगाहें
दस्तक 7 मिडिया, उत्तम/प्रशांत/ दरभंगा।
रविवार का दिन बिहार के शिक्षा जगत के लिए एक ऐतिहासिक रहा। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा राज्यव्यापी ऑनलाइन कार्यक्रम के माध्यम से सरस्वती विद्या निकेतन (आदर्श विद्यालय)’ का विधिवत शुभारंभ किया गया। यह केवल एक विद्यालय का उद्घाटन नहीं, बल्कि राज्य के उज्ज्वल भविष्य और नई पीढ़ी के सर्वांगीण विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का एक सशक्त प्रतीक है।
इस आदर्श विद्यालय के माध्यम से क्षेत्र के छात्रों को अब आधुनिक तकनीक, बेहतर आधारभूत संरचना और उच्च गुणवत्ता वाली शैक्षणिक सुविधाएं सुलभ होंगी। शिक्षाविदों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यह पहल न केवल शिक्षा के स्तर को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी, बल्कि बच्चों के भीतर अनुशासन और ज्ञान का एक ऐसा आधार तैयार करेगी जो उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करेगा।
जहां एक ओर इस नई पहल का हर तरफ स्वागत हो रहा है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों का तर्क है कि आदर्श विद्यालयों का निर्माण तभी सार्थक होगा, जब स्कूलों का संचालन करने वाले प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी के पदों पर विधिवत और पूर्णकालिक अधिकारियों की नियुक्ति होगी।
वर्तमान में,अन्य विभागों के पदाधिकारियों को बीईओ जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पद का ‘अतिरिक्त प्रभार’ सौंपे जाने की व्यवस्था शिक्षा व्यवस्था की जड़ों को कमजोर कर रही है। आम धारणा यह है कि दूसरे विभागों के पदाधिकारी अपने मूल विभाग की जटिलताओं में व्यस्त रहते हैं, जिससे शिक्षा विभाग जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए उनके पास न तो पर्याप्त समय होता है और न ही आवश्यक एकाग्रता। अतिरिक्त प्रभार के कारण शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यालयी मॉनिटरिंग और बच्चों के शैक्षणिक माहौल पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें शिक्षा की कमान किसी और विभाग के कंधों पर हो, वह विभाग की गुणवत्ता के दावों पर स्वतः ही एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देती है। शिक्षाविदों और अभिभावकों का कहना है कि
यदि सरकार वास्तव में नई पीढ़ी के बच्चों के भविष्य को लेकर गंभीर है और ‘आदर्श विद्यालयों’ की परिकल्पना को धरातल पर उतारना चाहती है, तो उसे कागजी औपचारिकताओं से आगे बढ़ना होगा। प्रदेश में अधिकांश रिक्त पड़े बीईओ के पदों को अविलंब नियमित अधिकारियों से भरना शिक्षा सुधार की पहली और अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।शिक्षा समाज की आधारशिला है, और इस आधारशिला को अतिरिक्त प्रभार की बैसाखियों के सहारे नहीं, बल्कि समर्पित और पूर्णकालिक प्रशासनिक नेतृत्व की मजबूती की आवश्यकता है।
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