राज्य को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो सरकार को चुनावी लाभ से ऊपर उठकर आर्थिक और औद्योगिक सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी– डॉ.सुष्मिता
राज्य को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो सरकार को चुनावी लाभ से ऊपर उठकर आर्थिक और औद्योगिक सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी– डॉ.सुष्मिता
राज्य को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो सरकार को चुनावी लाभ से ऊपर उठकर आर्थिक और औद्योगिक सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी– डॉ.सुष्मिता
दस्तक 7 मिडिया, दरभंगा।
लेखिका डॉ.सुष्मिता कुमारी की दस्तक 7 मिडिया के साथ बातचीत में उन्होंने बिहार की अर्थव्यवस्था की उन जटिलताओं को उजागर किया है, जो अक्सर चुनावी शोर-शराबे में दब जाती हैं।
कर्ज का बोझ – CAG की रिपोर्ट का हवाला देते हुए लेख स्पष्ट करता है कि राज्य पर ₹3.5 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज है और ऋण-जीएसडीपी अनुपात (38-40%) चिंताजनक स्थिति में है।
वित्तीय निर्भरता – राज्य का 60% से 70% राजस्व केंद्र पर निर्भर है। औद्योगिक आधार की कमी के कारण अपना स्वयं का टैक्स कलेक्शन बहुत कम है।
कमिटेड एक्सपेंडिचर’ का जाल:–
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, बजट का एक बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाता है, जिससे विकास कार्यों और नई स्थायी भर्तियों के लिए बजट की कमी हो जाती है।
नीतिगत प्रभाव– शराबबंदी से हुए राजस्व नुकसान और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की नगण्य दर ने बिहार की वित्तीय स्थिति को और अधिक कमजोर किया है।
लेखिका डॉ.सुष्मिता का मानना है कि इस वित्तीय संकट का खामियाजा युवा वर्ग और संविदा कर्मियों को भुगतना पड़ रहा है। परीक्षाओं में देरी, जॉइनिंग में वर्षों का अंतराल, और संविदा पर काम करने वाले युवाओं का शोषण—यह सब ‘खाली तिजोरी’ की ही देन है।
डॉ.सुष्मिता कुमारी ने बताया कि भ्रमण के दौरान बिहार को इस ‘कर्ज के जाल’ से बाहर निकालने के विषय पर प्रबुद्ध लोगों से बातचीत की। जिसमें चार महत्वपूर्ण उपाय सुझाव सामने आये है।
जिसमें–
1.औद्योगिक सुधार– लालफीताशाही समाप्त कर ‘सिंगल-विंडो सिस्टम’ लागू करना और बुनियादी ढांचे (एक्सप्रेसवे, बिजली) को बेहतर बनाना ताकि निवेश आकर्षित हो सके।
2.कृषि-आधारित उद्योग–मखाना,लीची और जूट जैसे क्षेत्रों में फूड प्रोसेसिंग क्लस्टर बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना।
3.राजकोषीय अनुशासन– FRBM अधिनियम का सख्ती से पालन करना, शराबबंदी नीति की व्यावहारिक समीक्षा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों से गैर-कर राजस्व बढ़ाना।
4.कौशल विकास:– युवाओं को पारंपरिक डिग्री के स्थान पर एआई ,आईटी और आधुनिक डिजिटल तकनीक में दक्ष बनाना ताकि वे ‘नौकरी मांगने वाले’ से ‘नौकरी देने वाले’ बन सकें।
लेखिका का निष्कर्ष–
डॉ.सुष्मिता का निष्कर्ष स्पष्ट है कि ‘मुफ्त की राजनीति’ और केवल कर्ज लेकर नौकरियां बांटने का मॉडल बिहार के लिए स्थायी समाधान नहीं है। यदि राज्य को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो सरकार को चुनावी लाभ से ऊपर उठकर कड़े आर्थिक और औद्योगिक सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी।
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