मजहब से ऊपर राष्ट्रधर्म, मधुबनी के ताज़िया जुलूस में गूंजा इंकलाब, मिसाल बनी कौमी एकता
मजहब से ऊपर राष्ट्रधर्म, मधुबनी के ताज़िया जुलूस में गूंजा इंकलाब, मिसाल बनी कौमी एकता
मजहब से ऊपर राष्ट्रधर्म, मधुबनी के ताज़िया जुलूस में गूंजा इंकलाब, मिसाल बनी कौमी एकता
दस्तक 7 मिडिया, मधुबनी।
आज के दौर में जब सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में धर्म और जाति के नाम पर नफरत व तनाव की खबरें अक्सर सुर्खियां बनती हैं, बिहार के मधुबनी से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने न केवल कौमी एकता की मिसाल कायम की है, बल्कि पूरी दुनिया को मानवता और राष्ट्रप्रेम का संदेश दिया है।
बीते 26 जून को मुहर्रम के मुकद्दस मौके पर मधुबनी की सड़कों का नजारा कुछ अलग और प्रेरणादायक था। पारंपरिक ‘ताजिया’ और ‘दहिया’ जुलूस के दौरान, जहां एक तरफ आस्था का सैलाब था, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रभक्ति का जज्बा भी चरम पर दिखा। इस जुलूस में केवल धार्मिक ध्वज ही नहीं, बल्कि सबसे आगे देश के गौरवों की तस्वीरें गर्व के साथ लहरा रही थीं।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह, जिनकी तस्वीर युवाओं को नफरत और कट्टरता से ऊपर उठकर वैचारिक इंकलाब और देशसेवा की प्रेरणा देती है।
भारत भूषण तिवारी, जो स्थानीय स्तर पर समाज को जोड़ने और आपसी सौहार्द को बढ़ावा देने के प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं।
यह दृश्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि धर्म व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन देश का गौरव साझा होता है। इस अनूठी पहल ने साबित किया कि जब राष्ट्र और शहीदों के सम्मान की बात आती है, तो धर्म की हर दीवार ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। मधुबनी के मुस्लिम समुदाय ने यह संदेश दिया कि असली ताकत लोगों को आपस में ‘जोड़ने’ में है, न कि उन्हें बांटने में।”पत्थर नहीं, फूल बनिए” समाज के नाम संदेश–
मधुबनी से उठी सौहार्द की यह गूंज उन तमाम असामाजिक तत्वों के लिए एक करारा जवाब है, जो त्योहारों को कट्टरता दिखाने का जरिया बनाने की कोशिश करते हैं। यह पहल उन लोगों के लिए एक सीख है जो राजनीति के चलते भाई को भाई से लड़ाते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने मशहूर शायर इक़बाल की उन पंक्तियों को एक बार फिर चरितार्थ कर दिया।
“मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा।”
मधुबनी की यह पहल हमें याद दिलाती है कि जब तक आम नागरिक के दिल में ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना जिंदा है, तब तक भारत की विविधता और एकता को कोई चुनौती नहीं दे सकता। नफरत को दरकिनार कर इस राष्ट्रीय एकता के कारवां को आगे बढ़ाना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि जब देश मुस्कुराएगा, तभी हर त्योहार शांति और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा सकेगा।
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