राज्य के सरकारी दफ्तरों में ‘समानांतर सरकार’ सरकारी कुर्सियों के पीछे छिपे ‘निजी चेहरों'(बिचौलिए) का खेल
राज्य के सरकारी दफ्तरों में ‘समानांतर सरकार’ सरकारी कुर्सियों के पीछे छिपे ‘निजी चेहरों'(बिचौलिए) का खेल
राज्य के सरकारी दफ्तरों में ‘समानांतर सरकार’ सरकारी कुर्सियों के पीछे छिपे ‘निजी चेहरों'(बिचौलिए) का खेल
दस्तक 7 मिडिया, विशेष संवाददाता,पटना।
राज्य के सरकारी कार्यालयों से एक ऐसा कड़वा सच सामने आ रहा है जो पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है। हर सुबह जैसे ही सरकारी कार्यालयों के मुख्य द्वार खुलते हैं, ठीक उसी वक्त कुछ रसूखदार ‘प्राइवेट’ चेहरों( बिचौलिया) का आगमन होता है। इनका अंदाज देखकर कोई भी धोखा खा सकता है कि दफ्तर चलाने की असली जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर है।
ये रसूखदार निजी लोग किसी भी विभाग की सरकारी संचिकाओं (फाइलों) को इस तरह खंगालते हैं मानो वे ही वहां के मुख्य नीति-निर्धारक हों। विडंबना यह है कि अपनी समस्याओं को लेकर आने वाले आम फरियादियों को विभागीय अधिकारियों तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता, उससे पहले ही ये ‘प्राइवेट’ लोग मामले का निजी स्वार्थ को लेकर अपने स्तर पर ‘निपटारा’ कर देते हैं।
इन निजी लोगों की पैठ सिर्फ फाइलों तक ही सीमित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, कार्यालयों पर इनकी इतनी मजबूत पकड़ है कि वरीय अधिकारियों की मेज पर आने वाले सरकार के अति-गोपनीय निर्देश और रणनीतियां भी आम लोगों और खास तौर पर बिचौलियों के बीच साझा हो जाती हैं। प्रशासनिक गोपनीयता, जो किसी भी सरकारी तंत्र की रीढ़ होती है, वह इन दफ्तरों में पूरी तरह तार-तार हो चुकी है।
यदि इस पूरे खेल की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो यह साफ हो जाएगा कि कार्यालय में पदस्थापित छोटे से लेकर बड़े सरकारी कर्मचारी पूरी स्थिति से न सिर्फ वाकिफ हैं, बल्कि उनकी मौन सहमति भी इसमें शामिल है। जानकारों की मानें तो राज्य के लगभग सभी महत्वपूर्ण सरकारी विभागों (जैसे निबंधन, राजस्व,मनरेगा,प्रखंड, पुलिस और कल्याण विभाग) में इन प्राइवेट लोगों ने अपना समानांतर नेटवर्क स्थापित कर लिया है। इसका सीधा खामियाजा विभिन्न जिले की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है, जो कदम-कदम पर आर्थिक शोषण और मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रही है। बिना ‘चढ़ावे’ और इन बिचौलियों की मर्जी के एक कार्य का निष्पादन तक नहीं होता है।
जब इस अव्यवस्था की तह में जाने की कोशिश की गई, तो अधिकांश जिले में इसका सबसे मुख्य और तकनीकी कारण सरकारी कर्मचारियों की भारी कमी के रूप में सामने आया। स्वीकृत पदों की तुलना में आधे से भी कम कर्मचारियों के भरोसे विभाग चल रहे हैं।
यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है। यदि सरकार और उच्च प्रशासन सचमुच जनता के प्रति जवाबदेह हैं, तो उन्हें तुरंत दो मोर्चों पर कड़े कदम उठाने होंगे।
राज्य में सरकारी विभागों में खाली पड़े पदों पर अविलंब स्थाई नियुक्तियां की जाएं ताकि ‘काम के दबाव’ खत्म हो सके। सरकारी कार्यालयों में केवल अधिकृत कर्मियों के प्रवेश की अनुमति हो। बाहरी और संदिग्ध लोगों के दफ्तर में बैठने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए और सीसीटीवी कैमरों की निगरानी बढ़ाई जाए। वक्त आ गया है कि सरकार इस ‘समानांतर सिंडिकेट’ को तोड़े, वरना डिजिटल इंडिया और सुशासन के तमाम दावे इन दफ्तरों की फाइलों में ही दफन होकर रह जाएंगे।