विशेष रिपोर्ट  :व्यवस्था के गाल पर तमाचा -आरा, आत्मसमर्पण/ एनकाउंटर मामले ने खड़े किए लोकतंत्र पर गंभीर सवाल – डॉ.सुष्मिता।

दस्तक 7 मिडिया, पटना/आरा।

बिहार के आरा की धरती, जो कभी बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे महान योद्धाओं के शौर्य और अन्याय के खिलाफ लड़ाई की गवाह रही है, आज एक बार फिर चर्चा में है। लेकिन इस बार वजह कोई गौरवशाली गाथा नहीं, बल्कि व्यवस्था की कथित दमणकारी कार्यप्रणाली है। आत्मसमर्पण करने के बाद आरा के समर्पित समाजसेवी भारत भूषण तिवारी की एक पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत ने पूरे प्रशासनिक और लोकतांत्रिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
इस घटना को लेकर बुद्धिजीवियों और समाज में भारी आक्रोश है। लेखिका,सामाजिक चिंतक एवं स्तंभकारी डॉ.सुष्मिता कुमारी ने इस घटना की तुलना औपनिवेशिक मानसिकता से करते हुए इसे ‘स्वप्निल भारत’ के सीने में दागी गई गोली और ‘लोकतंत्र की मौत’ करार दिया है।
इस घटना ने यह कड़वा सच एक बार फिर सामने ला दिया है कि भले ही देश से ब्रिटिश हुकूमत खत्म हो गई हो, लेकिन पुलिस व्यवस्था का ढांचा आज भी उसी दमनकारी ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ से ग्रस्त दिखाई देता है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाएं और बातचीत या न्याय के कानूनी गलियारों के बजाय फर्जी एनकाउंटर की भाषा बोलने लगें, तो यह साफ है कि देश में लोकतंत्र नहीं, बल्कि ‘लाठी का शासन’ हावी हो रहा है।
भारतीय संविधान हर नागरिक को ‘विधि के समक्ष समानता’ और ‘जीवन का अधिकार’ (अनुच्छेद 21) देता है। लेकिन इस तरह के कथित एनकाउंटर अक्सर ‘न्यायेतर हत्या’ (Extrajudicial Killing) की श्रेणी में आते हैं। जब पुलिस खुद ही न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद की भूमिका तय करने लगे, तो न्यायपालिका का अस्तित्व सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है। समाज के गरीब, नि:सहाय लोगों के अधिकारों की आवाज उठाने वाले भारत भूषण तिवारी की मौत ने यह बड़ा सवाल छोड़ दिया है कि क्या स्वतंत्र भारत में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना अब गुनाह बन चुका है ?
इस दर्दनाक घटना और व्यवस्था के क्रूर चेहरे पर प्रहार करते हुए सामाजिक चिंतक डॉ. सुष्मिता का मानना है कि यह कोई एनकाउंटर नहीं बल्कि वर्दी की आड़ में छिपी एक घिनौनी करतूत है, जिसने कानून को मौन कर दिया है। इस घटना के बाद बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज ने व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव की मांग तेज कर दी है। पुलिस बल को राजनीतिक दबाव और प्रतिशोध की भावना से पूरी तरह मुक्त कर स्वतंत्र किया जाए। आजादी का मतलब सिर्फ अंग्रेजों का जाना नहीं, बल्कि देश में ‘कानून का शासन’ स्थापित करना था। आरा की यह घटना पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते इस व्यवस्था को नहीं सुधारा गया, तो लोकतंत्र केवल पन्नों में सिमटा एक बेजान शब्द बनकर रह जाएगा।