“गलत पर्यवेक्षण टिप्पणी या पुलिसिया जल्दबाजी ?”पत्रकार के गिरफ्तारी पर उठे सवाल ?पत्रकार की गिरफ्तारी के बाद अपराधियों जैसा व्यवहार ,कहां तक उचित ?अब सबकी निगाहें न्यायालय पर।

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय 

दरभंगा सदर 2 में पदस्थापित एसडीपीओ एस के सुमन की  पर्यवेक्षण टिप्पणी ने पुलिसिया कार्यशैली पर प्रश्न खड़ा कर दिया है। पदाधिकारियों की कार्यशैली यदि इस तरह रही, तो पुलिस पर से लोगों का भरोसा ही उठ जाएगा। मामले की बिना समुचित जांच किये, बंद कमरे में प्रमुख और उनके समर्थकों का कथित बयान दर्ज कर, एससी एसटी जैसे गंभीर मामले में एक पत्रकार को लपेट लिया। आनन फानन में पत्रकार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया , मानो वह पत्रकार बड़ा अपराधी हो।
यही नहीं अनुसंधानकर्ता और केवटी थाना की पुलिस ने उस पत्रकार के साथ जो व्यवहार किया, वह तो गिनीज बुक में नाम लिखने लायक है। आखिर ऐसी कौन सी जल्दीबाजी हो गई कि एसडीपीओ और थाना पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ दिन बाद पत्रकार को हिरासत में ले लिया। घंटों थाने पर बैठाकर उसे छोड़ दिया। फिर दो चार ही दिन बीते कि केवटी पुलिस ने खाना खा रहे पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया। पत्रकार को न तो घर में खाना खाने दिया और न ही घंटों थाना पर बैठाने के दौरान ही कुछ खाने दिया। थाना पर घंटों बैठाया और न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
यह मामला केवटी थाना में दर्ज कांड 176/26 से संबंधित है। मामले में आरटीआई कार्यकर्ता इकबाल अंसारी और पत्रकार विजय कुमार गुप्ता को आरोपी बनाया गया है। इकवाल पर गाली गलौज, जाति सूचक गाली और रंगदारी मांगने तथा पत्रकार विजय गुप्ता पर रंगदारी का 50 हजार रुपये लेने का आरोप है।
इस मामले में असलियत यह है कि प्रमुख के खिलाफ इकबाल ने डीएम समेत आयुक्त को एक पत्र प्रेषित किया था, जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रमुख द्वारा योजनाओं में गड़बड़ी की गई है। इस मामले को पत्रकार विजय ने खबर के तौर पर प्रकाशित किया। खबर के आलोक में अनियमितता की जांच हुई। जांच टीम ने योजना में गड़बड़ी पायी। डीएम समेत आयुक्त ने गवन की राशि वसूल करने का आदेश दे दिया। इस बात से आहत प्रमुख ने कई आरोप लगाते हुये दोनों पर प्राथमिकी दर्ज करा दी। आनन फानन में एसडीपीओ की पर्यवेक्षण टिप्पणी निकली और केवटी थाना पुलिस ने पत्रकार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जबकि इस घटना की वास्तविकता कुछ और थी। करीब आठ माह पूर्व प्रमुख ने उक्त पत्रकार से 50 हजार रुपया दो महीने की शर्त पर बतौर कर्ज लिया था। जब तीन महीना बीत गया तो पत्रकार उससे अपने पैसे मांगने लगा। आज कल करते हुये प्रमुख ने कई महीने खेप दिये। पत्रकार ने जब दबाव बनाया तब प्रमुख ने पैसा दिया , बतौर गवाह पंचायत समिति सदस्य जगदीर यादव को रखा। एसडीपीओ ने साक्षी के रूप में जगदीर यादव के हवाले से अपने पर्यवेक्षण में लिखा है कि प्रखंड प्रमुख जीवछी देवी और उनका लड़का आये थे। 50 हजार की बात चल रही थी। प्रमुख के पति अशोक पासवान द्वारा पत्रकार को 39 हजार रुपया दिया गया था। इस बात का रेकार्डिंग प्रस्तुत किया गया।
दरअसल पत्रकार से जो 50 हजार रुपये लिये गये थे, उसमें 39 हजार लौटाया गया और अभी भी 11हजार रुपये पत्रकार का बांकी ही है। ऐसे में बिना तथ्य के पर्यवेक्षण टिप्पणी निकालना और केवटी पुलिस द्वारा अपराधियों जैसा बर्ताव कर पत्रकार को जेल भेजना कहां तक सही है? क्या यह एससी /एसटी एक्ट का दुरुपयोग नहीं है?एसडीपीओ को एससी /एसटी जैसे गंभीर मामलों में कानून का इस्तेमाल पूरी सतर्कता और निष्पक्षता के साथ करना चाहिये था ताकि ना तो पीड़ित को न्याय से वंचित होना पड़े और ना ही किसी निर्दोष को अनावश्यक प्रताड़ित होना पड़े लेकिन ऐसा लगता हे कि उनके पर्यवेक्षण टिप्पणी कहीं विशेष लाभ का संकेत तो नहीं ?