“गलत पर्यवेक्षण टिप्पणी या पुलिसिया जल्दबाजी,यानि जाँच से पहले फ़ैसला ?पत्रकार की गिरफ्तारी पर उठे गंभीर सवाल” केवटी कांड संख्या 176/26 में पत्रकार विजय कुमार गुप्ता की गिरफ्तारी को लेकर विवाद गहराया, एसडीपीओ की जांच प्रक्रिया और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल ?
“गलत पर्यवेक्षण टिप्पणी या पुलिसिया जल्दबाजी,यानि जाँच से पहले फ़ैसला ?पत्रकार की गिरफ्तारी पर उठे गंभीर सवाल” केवटी कांड संख्या 176/26 में पत्रकार विजय कुमार गुप्ता की गिरफ्तारी को लेकर विवाद गहराया, एसडीपीओ की जांच प्रक्रिया और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल ?
“गलत पर्यवेक्षण टिप्पणी या पुलिसिया जल्दबाजी,यानि जाँच से पहले फ़ैसला ?पत्रकार की गिरफ्तारी पर उठे गंभीर सवाल” केवटी कांड संख्या 176/26 में पत्रकार विजय कुमार गुप्ता की गिरफ्तारी को लेकर विवाद गहराया, एसडीपीओ की जांच प्रक्रिया और पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल ?
दस्तक 7मीडिया/संजय कुमार राय
दरभंगा सदर-2 में पदस्थापित एसडीपीओ एस.के. सुमन की पर्यवेक्षण टिप्पणी और उसके आधार पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर क्षेत्र में गंभीर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों एवं पत्रकार संगठनों का आरोप है कि यदि इसी प्रकार बंद कमरों में बैठकर एसडीपीओ द्वारा जांच और पर्यवेक्षण रिपोर्ट तैयार की जाएगी तो पुलिस प्रशासन से आम लोगों का विश्वास उठना स्वाभाविक है।एसडीपीओ समेत केवटी थाना पुलिस द्वारा की गई ज़ल्दबाज़ी में कार्रवाई कई सवालों को जन्म दे रहा है ।
मामला केवटी थाना कांड संख्या 176/26 से जुड़ा है, जिसमें इकबाल अंसारी और पत्रकार विजय कुमार गुप्ता को नामजद अभियुक्त बनाया गया है। प्राथमिकी में पत्रकार पर 50 हजार रुपये रंगदारी मांगने, गाली-गलौज करने समेत अन्य आरोप लगाए गए हैं।इकवाल और पत्रकार दो अलग अलग अभियुक्तों में इकवाल से पत्रकार को कोई लेना देना नहीं हे हाँ इतना ज़रूर हे कि इक़वाल अंसारी ने योजना में गड़बड़ी को लेकर प्रमुख के विरुद्ध आयुक्त/डीएम से शिकायत की थी,और योजना में गड़बड़ी को लेकर पत्रकार ने ख़बर छापा था ,अब सवाल उठता हे कि पत्रकार खबर छापना ही छोड़ दे और नेताओ के चरण वंदना में भिड़े जाए ,ताकि सरकारी राशि का लोग गवन करते रहे ,और पत्रकार मूक दर्शक बना रहे ?
इस मामले में यही हुआ भी हे,जाँच के बाद योजना में अनियमितता पाई गई और डीएम ने गड़बड़ी के लाखो रुपये वसूलने का आदेश भी दे दिया हे ।इससे तिलमिलाए प्रमुख ने पत्रकार समेत इकवाल पर एससी एसटी का मुकदमा ठोक दिया और आनन फानन में पुलिस ने पत्रकार को ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया ।
आरोप है कि प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ ही दिनों के भीतर एसडीपीओ द्वारा पर्यवेक्षण रिपोर्ट तैयार कर ली गई और उसके बाद केवटी थाना पुलिस ने तेजी दिखाते हुए पत्रकार विजय कुमार गुप्ता को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इस कार्रवाई को लेकर लोगों के बीच चर्चा है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनके कारण मामले में इतनी जल्दबाजी दिखाई गई,क्या पत्रकार विजय बहुत बड़ा अपराधी था ।
जानकारी के अनुसार, प्रमुख के खिलाफ इकबाल अंसारी ने जिलाधिकारी एवं आयुक्त को शिकायत पत्र भेजकर योजनाओं में अनियमितता का आरोप लगाया था। इस शिकायत को पत्रकार विजय कुमार गुप्ता ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। बाद में हुई जांच में अनियमितता पाए जाने पर संबंधित राशि की वसूली का आदेश भी जारी किया गया। आरोप है कि इसी से नाराज होकर प्रमुख द्वारा दोनों व्यक्तियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई गई जिसे निष्पक्ष होकर जांच करना पुलिस पदाधिकारियों ने उचित नहीं समझा।
विवाद का दूसरा पक्ष और भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। आरोपित पक्ष का दावा है कि करीब आठ माह पूर्व प्रखंड प्रमुख द्वारा पत्रकार विजय कुमार गुप्ता से दो माह के लिए 50 हजार रुपये उधार लिए गए थे। निर्धारित समय बीतने के बाद पत्रकार अपने पैसे वापस मांग रहे थे। आरोप है कि कई महीनों तक टालमटोल के बाद 39 हजार रुपये वापस किए गए, जबकि 11 हजार रुपये अभी भी बकाया हैं।
बताया जाता है कि इस लेन-देन के गवाह पंचायत समिति सदस्य जगतवीर यादव थे। आरोपित पक्ष का कहना है कि एसडीपीओ की पर्यवेक्षण टिप्पणी में भी जगतवीर यादव के हवाले से यह उल्लेख है कि 50 हजार रुपये के लेन-देन की बातचीत हुई थी तथा अशोक पासवान द्वारा 39 हजार रुपये पत्रकार को दिए गए थे, जिसकी रिकॉर्डिंग भी प्रस्तुत की गई थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि 39 हजार रुपये की वापसी की बात स्वयं पर्यवेक्षण में दर्ज है तो क्या यह रंगदारी का मामला था या फिर पूर्व के आर्थिक लेन-देन का विवाद था ,जिसे जांच करना आवश्यक था ,लेकिन एसडीपीओ ने ऐसा नहीं किया ?
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस को मामले की निष्पक्ष जांच कर दोनों पक्षों के सभी साक्ष्यों का परीक्षण करना चाहिए था। आरोप है कि बिना पर्याप्त पड़ताल के पत्रकार को अपराधियों की तरह हिरासत में लेकर घंटों थाने में बैठाया गया और बाद में जेल भेज दिया गया,जैसे स्थानीय पुलिस को पहले से पत्रकार के विरुद्ध कोई विष भरा हो ?
प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ ही दिनों के भीतर पर्यवेक्षण रिपोर्ट तैयार होने और फिर त्वरित गिरफ्तारी की कार्रवाई को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। लोगों का कहना है कि एससी-एसटी एक्ट जैसे गंभीर कानून का इस्तेमाल पूरी सतर्कता और निष्पक्षता के साथ होना चाहिए, ताकि न तो पीड़ित को न्याय से वंचित होना पड़े और न ही किसी निर्दोष को अनावश्यक प्रताड़ना झेलनी पड़े।
फिलहाल मामला न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में अब सबकी निगाहें न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं। वहीं क्षेत्र में यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच हुई या फिर जल्दबाजी में की गई कार्रवाई ने पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है कि “पत्रकार को अपराधी की तरह जेल भेजने की क्या जल्दबाजी थी ?”कहीं अप्रत्यक्ष रूप से पैसों का दम खम तो नहीं,जिसके कारण सभी ने जल्दबाजी दिखाई और पत्रकार को जेल भेज दिया।
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“गलत पर्यवेक्षण टिप्पणी या पुलिसिया जल्दबाजी ?”पत्रकार के गिरफ्तारी पर उठे सवाल ?पत्रकार की गिरफ्तारी के बाद अपराधियों जैसा व्यवहार ,कहां तक उचित ?अब सबकी निगाहें न्यायालय पर।