जमीनी हकीकत से दूर प्रशासन का ‘कागजी’ फरमान, बिरौल में नदी किनारे लगा चेतावनी बोर्ड, पर सालों का कचरा साफ करना भूला नगर पंचायत
जमीनी हकीकत से दूर प्रशासन का ‘कागजी’ फरमान, बिरौल में नदी किनारे लगा चेतावनी बोर्ड, पर सालों का कचरा साफ करना भूला नगर पंचायत
जमीनी हकीकत से दूर प्रशासन का ‘कागजी’ फरमान, बिरौल में नदी किनारे लगा चेतावनी बोर्ड, पर सालों का कचरा साफ करना भूला नगर पंचायत
दस्तक 7 मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा।
नगर पंचायत बिरौल क्षेत्र के मध्य से गुजरने वाली सहायक कमला नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए नगर प्रशासन ने एक कड़ा रुख अख्तियार किया है। प्रशासन ने बकायदा बोर्ड लगाकर चेतावनी दी है कि नदी में कचरा फेंकने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई और जुर्माना लगाया जाएगा। लेकिन, प्रशासन का यह फरमान जितना सख्त कागजों और बोर्ड पर दिख रहा है, जमीन पर उसकी हकीकत उतनी ही खोखली है।
नगर प्रशासन बिरौल द्वारा सार्वजनिक रूप से जारी आदेश के तहत शहर और नदी के घाटों के आसपास विशेष चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं।
नदी में किसी भी प्रकार का प्लास्टिक, घरेलू कचरा या पूजा-सामग्री फेंकना सख्त मना है। आदेश का उल्लंघन करने वाले और नदी को डंपिंग ग्राउंड समझने वाले लोगों को बख्शा नहीं जाएगा और पकड़े जाने पर नियमानुसार दंडित किया जाएगा।
प्रशासन के मुताबिक, इस बोर्ड को लगाने का मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों को जागरूक करना और नदी को सीधे तौर पर प्रदूषित होने से रोकना है।
प्रशासन के इस फरमान के बीच यदि आप अफजला खेबा पुल घाट का रुख करेंगे, तो तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। पुल घाट की स्थिति यह प्रमाणित करने के लिए काफी है कि नदी में कचरे का साम्राज्य आज का नहीं, बल्कि कई वर्षों पुराना है। आखिर इतने वर्षों से नगर प्रशासन इस बदहाली पर कुंभकर्णी नींद क्यों सोया रहा? आज जब अचानक प्रशासन जागा भी, तो उसका ध्यान सालों से जमा गंदगी को साफ करने के बजाय सिर्फ एक चेतावनी बोर्ड टांगने पर ही जाकर सिमट गया।
स्थानीय नागरिकों और राहगीरों में प्रशासन के इस एकतरफा रवैये को लेकर भारी आक्रोश है। इस पुल से गुजरने वाले लोगों का जीना यहां से उठने वाली तीव्र दुर्गंध ने मुहाल कर रखा है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को जुर्माना लगाने से पहले नदी तट पर जमा सालों पुराने कचरे के ढेर को साफ करना चाहिए था। लोगों पर कार्रवाई का डंडा चलाने से पहले नगर पंचायत को पूरे क्षेत्र में डस्टबिन और कचरा कलेक्शन की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। जब लोगों के पास कचरा फेंकने का सही विकल्प होगा, उसके बाद ही नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई तर्कसंगत लगेगी। सिर्फ दफ्तरों में बैठकर और घाटों पर बोर्ड टांग देने से सहायक कमला नदी का अस्तित्व नहीं बचने वाला। स्थानीय राहगीरों और प्रबुद्ध नागरिकों की मांग है कि जिम्मेदार पदाधिकारियों को खुद एसी कमरों से बाहर निकलकर अफजल खेबा पुल घाट की हकीकत देखनी चाहिए। देखना यह है कि प्रशासन सिर्फ जुर्माना वसूलने में दिलचस्पी दिखाता है या पहले इस ऐतिहासिक नदी को गंदगी के इस नरक से मुक्ति दिलाता है।
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