रक्षक ही बने तस्करों के संरक्षक! मधुबनी में 419 किलो गांजा के साथ पुलिस-तस्कर गठजोड़ का पर्दाफाश”

डायल-112 की गाड़ी कर रही थी गांजा तस्करों की एस्कॉर्टिंग, STF ने रंगे हाथों पकड़ा; थानाध्यक्ष और दारोगा निलंबित, कई सवालों के घेरे में पुलिस तंत्र

दस्तक 7 मीडिया /दरभंगा 

मधुबनी जिले के सीमावर्ती इलाकों में शराब और गांजा की तस्करी आज से नहीं वर्षों से चर्चा से चर्चा का विषय हे ,यही कारण हे कि इस जिले में तैनात वरीय अधिकारियों की बल्ले बल्ले हे ?एक अरसे बाद पुलिस और तस्कर का गठजोड़ फिर सामने आया ,जब पुलिस की गाड़ी खुद तस्करों के वाहन को सुरक्षा देकर आगे बढ़ा रही थी ?भला हो स्पेशल टास्क फोर्स का जिन्होंने ऐन मौके पर डायल 112में तैनात सभी पुलिस कर्मियों के कार्यशैली को उजागर किया ?यही कारण रहा कि वर्षों पूर्व से  इस जिला में अप्रत्यक्ष रूप से सीमावर्ती थाने की बोली लगती रही हे और पदाधिकारी मालामाल होते आयें हे ?ऐसा नहीं हे कि  डायल 112की गाड़ी गांजा तस्करों को एक दिन सुरक्षा देकर आगे बढ़ा रही थी ,और ऐसा भी नहीं हे कि इसकी जानकारी स्थानीय थाना के थानाध्यक्ष या अन्य पदाधिकारी को पहले से  नहीं हो ?यह भी कथित रूप से सत्य हे कि गलत ढंग से उपार्जन किये गये पैसों की बंदरबांट ऊपर तक होती हे ,और मामला सामने आने पर खुद बच निकलने के लिये कारवाई कर मामले को इति श्री कर दिया जाता हे ?अगर ऐसा नहीं हे तो एसटीएफ की कारवाई से पहले कारवाई नहीं होना भी बड़ा प्रश्न खड़ा होता हे ??

जी हाँ ,मधुबनी जिले के सीमावर्ती इलाकों में शराब, गांजा ,सुपारी की तस्करी कोई नई कहानी नहीं है। वर्षों से नेपाल सीमा से जुड़े इस क्षेत्र में अवैध कारोबार फलता-फूलता रहा है और समय-समय पर पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती रही है। लेकिन इस बार जो तस्वीर सामने आई है, उसने कानून-व्यवस्था की पूरी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

जिस पुलिस पर समाज की सुरक्षा और अपराधियों पर शिकंजा कसने की जिम्मेदारी है, वही पुलिस यदि तस्करों की सुरक्षा कवच बन जाए तो आम लोगों का भरोसा किस पर टिकेगा?

बिहार पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने बासोपट्टी थाना क्षेत्र में जिस तरह गांजे की बड़ी खेप के साथ डायल-112 की पुलिस टीम को रंगे हाथों पकड़ा , वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि पुलिस महकमे के भीतर पनप रही उस बीमारी का संकेत है, जिसकी चर्चा वर्षों से होती रही है।

एसटीएफ ने छापेमारी के दौरान 4.19 क्विंटल (419 किलोग्राम) गांजा बरामद किया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि गांजा लदे वाहन को कोई अपराधी गिरोह नहीं, बल्कि बिहार पुलिस की डायल-112 की गाड़ी सुरक्षा प्रदान कर रही थी। कार्रवाई के दौरान पुलिस वाहन के चालक सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया गया।

यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या डायल-112 की गाड़ी पहली बार तस्करों को सुरक्षा दे रही थी? क्या स्थानीय थाना और उसके जिम्मेदार अधिकारियों को इस गतिविधि की जानकारी नहीं थी? क्या इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थों की तस्करी बिना किसी संगठित संरक्षण के संभव है?

इन सवालों का जवाब जांच के बाद मिलेगा, लेकिन यह मान लेना कठिन है कि इतना बड़ा खेल केवल कुछ निचले स्तर के कर्मियों तक सीमित था। सीमावर्ती इलाकों में वर्षों से जारी तस्करी और समय-समय पर सामने आने वाली शिकायतें इस ओर इशारा करती हैं कि कहीं न कहीं संरक्षण की एक मजबूत श्रृंखला काम कर रही थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मधुबनी के एसपी योगेंद्र कुमार ने बासोपट्टी थानाध्यक्ष और डायल-112 पर तैनात सब-इंस्पेक्टर को तत्काल निलंबित तो कर दिया जो स्वागतयोग्य है, लेकिन केवल निलंबन से जनता के मन में उठे सवाल शांत नहीं होंगे। जरूरत इस बात की है कि पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष जांच हो और यह पता लगाया जाए कि तस्करों को संरक्षण देने की इस व्यवस्था में और कौन-कौन शामिल थे।

एसटीएफ की इस कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यदि जांच एजेंसियां निष्पक्ष और स्वतंत्र होकर काम करें तो वर्दी की आड़ में छिपे चेहरे भी बेनकाब हो सकते हैं। अब जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह मामला केवल कुछ निलंबनों तक सीमित रहता है या फिर तस्करी और भ्रष्ट गठजोड़ की जड़ों तक पहुंचकर बड़ी कार्रवाई होती है।क्योंकि जब कानून के रखवाले ही अपराधियों के हमसफर बन जाएं, तब यह केवल एक विभाग की नहीं, पूरे सिस्टम की विफलता मानी जाती है।