“बेड नहीं मिला, नेता नहीं पिघले ,भाजपा कार्यकर्ता अमित झा की मौत ने दरभंगा की राजनीति को कटघरे में खड़ा कर दिया”अब सांत्वना देने घर पहुँच रहे हे नेता ?यह कैसी राजनीति ????

दस्तक 7मीडिया /दरभंगा 

दरभंगा की राजनीति पर ऐसा रक्तरंजित और आत्मा को झकझोर देने वाला कलंक शायद ही पहले कभी लगा हो, जहाँ वर्षों तक पार्टी का झंडा ढोने वाला, नेताओं के कार्यक्रमों में भीड़ जुटाने वाला, बूथ से लेकर संगठन तक अपनी पूरी जिंदगी झोंक देने वाला भाजपा कार्यकर्ता अमित झा आखिरकार अस्पताल के एक बेड के इंतज़ार में दम तोड़ गया।

बताया जाता है कि एम्स के पोर्टिको में अमित झा जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे। परिजन लगातार मंत्री, विधायक और बड़े भाजपा नेताओं को फोन करते रहे। हर तरफ से केवल आश्वासन मिलता रहा — “व्यवस्था हो जाएगी”, “दस मिनट में कॉल बैक करते हैं”, “चिंता मत कीजिए” — लेकिन उन शब्दों के पीछे कोई संवेदना नहीं थी, कोई व्यवस्था नहीं थी, कोई मदद नहीं थी।

उधर एंबुलेंस के भीतर अमित झा की साँसें टूटती रहीं और इधर सत्ता के गलियारों में फोन की घंटियाँ बजती रहीं। सवाल उठ रहा है कि आखिर वह राजनीतिक तंत्र कहाँ था, जिसके लिए अमित झा ने वर्षों तक अपनी जिंदगी खपा दी?

स्थानीय लोगों के अनुसार अमित झा उन कार्यकर्ताओं में थे, जो हर चुनाव में सबसे आगे दिखते थे। पार्टी के कार्यक्रमों में भीड़ जुटाना, नेताओं के स्वागत में दिन-रात लगे रहना, कार्यकर्ताओं की नाराज़गी दूर करना और संगठन को मजबूत करने के लिए लगातार काम करना उनकी पहचान थी। लेकिन जब वही कार्यकर्ता अस्पताल के दरवाजे पर जिंदगी की भीख माँग रहा था, तब पूरी राजनीतिक व्यवस्था मौन बनी रही।

सबसे दर्दनाक दृश्य उस समय सामने आया, जब अमित झा की पत्नी नेताओं को फोन कर-करके रोती रही, गिड़गिड़ाती रही कि “मेरे पति को बचा लीजिए”, लेकिन हर तरफ से केवल औपचारिक आश्वासन ही मिलता रहा। किसी ने बेड नहीं दिलाया। किसी ने इलाज की तत्काल व्यवस्था नहीं की। और अंततः इलाज के अभाव में अमित झा की मौत हो गई।

अब दरभंगा की गलियों में एक ही सवाल गूँज रहा है ,क्या समर्पित कार्यकर्ता की कीमत केवल चुनावी पोस्टर, नारे और भीड़ तक सीमित है?
क्या सत्ता तक पहुँचने के बाद नेताओं की संवेदनाएँ समाप्त हो जाती हैं?
क्या कार्यकर्ता केवल उपयोग की वस्तु बनकर रह गया है?

घटना के बाद नेताओं का अमित झा के घर पहुँचकर शोक जताना भी लोगों के निशाने पर है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि “जब जिंदगी बचानी थी तब कोई नहीं आया, अब श्रद्धांजलि देकर कौन सा अपराध धोया जा रहा है?”

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अमित झा की मौत केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की विफलता है जहाँ कार्यकर्ता को परिवार कहकर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन संकट की घड़ी में उसे अकेला छोड़ दिया जाता है।

दरभंगा में यह मामला अब केवल संवेदना का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का विषय बन चुका है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक लोग पूछ रहे हैं कि आखिर क्यों एक समर्पित भाजपा कार्यकर्ता को अस्पताल में बेड तक नहीं मिल पाया? क्यों सत्ता के इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद उसकी जान नहीं बच सकी?

अमित झा की मौत ने दरभंगा की राजनीति के उस भयावह चेहरे को सामने ला दिया है, जहाँ कार्यकर्ता की उपयोगिता उसकी मृत्यु तक सीमित दिखाई देती है। और यही वजह है कि अब यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि सत्ता की संवेदनहीनता के खिलाफ जनता के आक्रोश का प्रतीक बनती जा रही है।