“मां-बाप के सपनों से भ्रष्टाचार के दलदल तक : नौकरी मिलते ही क्यों बदल जाता है इंसान?”सरकारी कुर्सी मिलते ही ईमान क्यों हार जाता है? करोड़ों की अवैध कमाई की चाहत ने कई परिवारों की इज्जत मिट्टी में मिलाई उनके बच्चों ने ?
“मां-बाप के सपनों से भ्रष्टाचार के दलदल तक : नौकरी मिलते ही क्यों बदल जाता है इंसान?”सरकारी कुर्सी मिलते ही ईमान क्यों हार जाता है? करोड़ों की अवैध कमाई की चाहत ने कई परिवारों की इज्जत मिट्टी में मिलाई उनके बच्चों ने ?
“मां-बाप के सपनों से भ्रष्टाचार के दलदल तक : नौकरी मिलते ही क्यों बदल जाता है इंसान?”सरकारी कुर्सी मिलते ही ईमान क्यों हार जाता है? करोड़ों की अवैध कमाई की चाहत ने कई परिवारों की इज्जत मिट्टी में मिलाई उनके बच्चों ने ?
दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय
कभी वही बेटा बेरोजगारी के दिनों में घर के एक कोने में बैठा रहता था। मां मंदिर में माथा टेकती थी, पिता लोगों के सामने हाथ जोड़कर कहते थे “बस कहीं नौकरी लग जाए, जिंदगी संवर जाएगी।”
घर की आर्थिक तंगी, समाज के ताने और भविष्य की चिंता के बीच परिवार दिन-रात मेहनत करता है ताकि उनका बेटा या बेटी सरकारी नौकरी पा सके।
जब नियुक्ति पत्र हाथ में आता है तो पूरे गांव-मोहल्ले में मिठाई बंटती है। माता-पिता की आंखों में खुशी के आंसू होते हैं। उन्हें लगता है कि अब उनका बच्चा समाज में सम्मान से जिएगा, ईमानदारी से काम करेगा और परिवार का नाम रोशन करेगा।
लेकिन दुख तब होता है जब वही नौकरी, वही कुर्सी और वही अधिकार धीरे-धीरे इंसान के भीतर लालच पैदा करने लगता है। अच्छी-खासी सरकारी तनख्वाह मिलने के बावजूद कुछ लोग करोड़ों रुपये की अवैध कमाई के सपने देखने लगते हैं। फिर शुरू होता है शांत दिमाग से शातिर खेल।
कहीं अवैध वसूली, कहीं घूसखोरी, कहीं सत्ता का दुरुपयोग।
हाल के दिनों में सामने आए कई मामलों ने समाज को झकझोर दिया। किसी डीएसपी पर करोड़ों की अवैध संपत्ति , तो किसी इंस्पेक्टर के पास अकूत दौलत मिलने की बात सामने आई । कई पुलिस अधिकारियों और थानेदारों के वीडियो और ऑडियो वायरल हुए, जिनमें कथित अवैध लेन-देन की बातें सामने आईं। कार्रवाई भी हुई, निलंबन भी हुआ और जांच भी बैठी।
सिर्फ पुलिस विभाग ही नहीं, अन्य सरकारी विभागों के कई अधिकारी और कर्मी भी रिश्वत लेते पकड़े गए। विजिलेंस की कार्रवाई में जब नोटों की गड्डियां निकलती हैं तो सिर्फ एक कर्मचारी नहीं, बल्कि पूरा परिवार बदनाम होता है।
समाज उंगली उठाता है, लोग कहते हैं “देखो, कैसे पैसा कमाया।”
सबसे बड़ा दर्द उन माता-पिता को होता है जिन्होंने ईमानदारी की सीख देकर अपने बच्चे को बड़ा किया था। जिनकी जिंदगी की कमाई सिर्फ इज्जत थी, वही इज्जत एक गलत लालच की वजह से पल भर में धूल में मिल जाती है।
सरकारी नौकरी सेवा का माध्यम होती है, जनता का भरोसा होती है। यह कोई व्यापार नहीं कि कुर्सी के बदले उगाही की जाए। जिस पद पर बैठकर लोगों की मदद करनी चाहिए, वहीं अगर भय और भ्रष्टाचार का माहौल बने तो समाज का भरोसा टूटता है।आज जरूरत है आत्ममंथन की।जरूरत है यह समझने की कि पैसा सबकुछ नहीं होता।
कुछ करोड़ रुपये शायद आलीशान घर बना दें, लेकिन खोया हुआ चरित्र और सम्मान कभी वापस नहीं ला सकते।ईमानदारी से कमाई गई छोटी रोटी भी उस दौलत से कहीं बेहतर है, जो लोगों की बद्दुआ और भ्रष्टाचार से हासिल की गई हो।