राजनीति की भेंट चढ़ा हरिनगर, नेता चमका रहे सियासत, डर के साए में जीने को मजबूर ग्रामीण
राजनीति की भेंट चढ़ा हरिनगर, नेता चमका रहे सियासत, डर के साए में जीने को मजबूर ग्रामीण
राजनीति की भेंट चढ़ा हरिनगर, नेता चमका रहे सियासत, डर के साए में जीने को मजबूर ग्रामीण
दस्तक 7 मिडिया, कुशेश्वर स्थान, दरभंगा।
कुशेश्वर स्थान थाना के हरिनगर गांव में दो जातियों के बीच हुई हिंसक झड़प को साढ़े तीन महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, लेकिन गांव आज भी उस खौफनाक दिन के जख्मों से उबर नहीं पाया है। इस पूरे मामले में पुलिस ने शनिवार की रात दोनों पक्षों से एक-एक नामजद आरोपी पंकज झा और कैलाश पासवान को गिरफ्तार कर रविवार को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। थाना अध्यक्ष गौरव प्रसाद के मुताबिक, दोनों अलग-अलग प्राथमिकी में नामजद थे। लेकिन यह गिरफ्तारी उस गहरी समस्या का महज एक सिरा है, जिसने पूरे गांव को बंधक बना रखा है।
शुरुआत में यह मामला दो पक्षों के बीच मारपीट और तोड़फोड़ का था, जिसे जिला और अनुमंडल प्रशासन ने शांति समितियों की बैठकें कर शांत कराने की कोशिश भी की। कई दिनों तक पुलिस बल कैंप करता रहा। लेकिन जैसे ही इस घटना में ‘वोट बैंक’ की बू आई, विभिन्न राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के नेताओं का जमावड़ा शुरू हो गया।
नेताओं ने पक्ष और विपक्ष में बयानबाजी के ऐसे तीर छोड़े कि एक सामाजिक विवाद देखते ही देखते पूरी तरह से राजनीतिक रंग में रंग गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि नेताओं ने अपनी सियासत चमकाने के लिए दोनों पक्षों के बीच खाई को और चौड़ा कर दिया।
नेताओं के उकसावे और कानूनी पचड़ों का सबसे दर्दनाक असर हरिनगर के आम लोगों पर पड़ा है।
पहला पक्ष, घटना के हफ्तों बाद तक इस पक्ष के लोग गंभीर रूप से घायल होकर डीएमसीएच के बिस्तरों पर इलाज कराने को मजबूर रहे।
दूसरा पक्ष पुलिसिया कार्रवाई और 70 नामजद व 150 अज्ञात लोगों पर दर्ज मुकदमे के खौफ से इस पक्ष के पुरुष आज भी अपनी खेती-बारी छोड़कर दर-दर भटक रहे हैं। बड़ा सवाल जिन नेताओं ने इस संवेदनशील मामले को हवा दी, वे आज बंद कमरों में सुरक्षित हैं। वहीं दूसरी ओर, हरिनगर के घरों में चूल्हे मुश्किल से जल रहे हैं, खेती ठप है और गांव का भाईचारा कानूनी मुकदमों के बोझ तले दबा हुआ है।
शनिवार रात हुई दो गिरफ्तारियां यह साफ करती हैं कि कानून अपना काम कर रहा है, लेकिन सवाल अब भी वही है ,नेताओं की दी हुई नफरत की इस आग की कीमत हरिनगर कब तक चुकाता रहेगा?