बिरौल की सड़कों पर दौड़ती ‘खतरनाक लापरवाही’,क्या हम खुद अपने बच्चों को मौत की ओर धकेल रहे हैं?

दस्तक 7 मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा। 

दरभंगा जिले का बिरौल अनुमंडल इन दिनों एक ऐसी समस्या से जूझ रहा है जो किसी भी पल एक बड़े हादसे का कारण बन रही है। यहां की सड़कों पर नाबालिग लड़कों को बेखौफ होकर बाइक और टोटो (ई-रिक्शा) दौड़ाते देखा जा रहा है। विडंबना यह है कि इन बच्चों के मन में न तो कानून का डर है और न ही अपनी जान की परवाह। अक्सर पकड़े जाने पर ये नाबालिग किशोर बड़े आत्मविश्वास के साथ कहते हैं, पुलिस ज्यादा से ज्यादा क्या करेगी? जुर्माना ही तो लेगी। यह सोच दर्शाती है कि यातायात नियमों का खौफ खत्म हो चुका है। पुलिस प्रशासन समय-समय पर जांच अभियान चलाकर हिदायत देता है, लेकिन केवल जुर्माना वसूल कर छोड़ देना पर्याप्त नहीं दिख रहा। क्या प्रशासन को अब इन बच्चों के बजाय उन अभिभावकों पर कड़ी कार्रवाई नहीं करनी चाहिए, जिन्होंने नासमझी में अपने बच्चों के हाथों में ‘मौत की चाबी’ सौंप दी है?

सवाल उन माता-पिता पर उठता है जो अपने नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने की खुली छूट देते हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, उनके हाथों में तेज रफ्तार वाहनों का हैंडल है। जब कोई अनहोनी होती है और सड़क दुर्घटना में किसी की जान जाती है, तब वही परिजन और ग्रामीण सड़क जाम कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हैं। सोचने वाली बात यह है, व्यवस्था को कोसने से पहले क्या हमने खुद से पूछा कि हमने अपने बच्चे को बिना लाइसेंस और बिना परिपक्वता के सड़क पर क्यों उतारा?

सड़क जाम करने और नारेबाजी करने से गया हुआ जीवन वापस नहीं आता। बिरौल क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों और अभिभावकों को यह समझना होगा कि

नाबालिग को वाहन देना बहादुरी नहीं, अपराध है।परिवहन नियमों का पालन प्रशासन की मजबूरी नहीं, आपकी सुरक्षा है।आज की एक छोटी सी ‘छूट’, कल उम्र भर का दुख बन सकती है। प्रशासन से भी यह मांग है कि केवल आर्थिक दंड तक सीमित न रहकर, ऐसे अभिभावकों के विरुद्ध कानूनी संज्ञान लिया जाए ताकि व्यवस्था में सुधार आ सके। आइए, हम सब मिलकर जिम्मेदारी उठाएं। अपने बच्चों को समझाएं और उन्हें तब तक वाहन न दें जब तक वे इसके लिए कानूनी और मानसिक रूप से तैयार न हो जाएं। आपकी सजगता ही आपके परिवार और समाज को सुरक्षित रख सकती है।