दरभंगा में बढ़ता ‘खतरनाक कड़ा’ कल्चर, युवाओं के हाथ में सजा यह शौक या मौत का सामान?

दस्तक 7 मिडिया, दरभंगा। 

मिथिला की हृदयस्थली दरभंगा और इसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों युवाओं के बीच एक अजीब और डरावना ‘फैशन’ पांव पसार रहा है। यह फैशन है—’घातक बाला’ (भारी धातु का कड़ा)। जिसे कभी धार्मिक या शौकिया तौर पर पहना जाता था, आज वही कड़ा अपराधी मानसिकता वाले युवाओं और नशेड़ियों के लिए एक ‘हथियार’ बन चुका है।

जानकारों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह साधारण दिखने वाला कड़ा अब मारपीट के दौरान ‘ब्रास नकल’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। आपसी रंजिश या छोटी-सी नोकझोंक में युवा इसे हाथ में पहनकर विपक्षी के सिर और नाजुक अंगों पर घातक प्रहार कर रहे हैं। लोहे या पीतल के इन भारी कड़ों से लगने वाली चोट इतनी गहरी होती है कि व्यक्ति मरणासन्न स्थिति में पहुंच जाता है। कई मामलों में तो इससे स्थायी अपंगता या ब्रेन हैमरेज तक का खतरा बना रहता है। हैरानी की बात यह है कि इस जानलेवा कड़े का प्रचलन उन युवाओं में सबसे अधिक है जो नशे के चंगुल में हैं। असामाजिक तत्व और आवारागर्दी करने वाले गुट इसे अपनी ‘शक्ति’ के प्रदर्शन के रूप में देख रहे हैं। दरभंगा के चौक-चौराहों से लेकर ग्रामीण हाट-बाजारों तक, इन युवाओं की बढ़ती तादाद सभ्य समाज के लिए एक खतरे की घंटी है। इस समस्या का सबसे दुखद पहलू यह है कि ये युवा अपने परिवार और अभिभावकों के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। घर के बड़े-बुजुर्गों की नसीहतों को अनसुना कर ये लड़के अपराध की इस गुमनाम दुनिया में कदम रख रहे हैं। जिस उम्र में हाथ में कलम या हुनर होना चाहिए, उस उम्र में ‘बाला’ पहनकर लहू बहाने की होड़ मची है। यदि समय रहते जिला प्रशासन और समाज के प्रबुद्ध लोगों ने इस पर अंकुश नहीं लगाया, तो आने वाला समय दरभंगा के सामाजिक ताने-बाने के लिए बेहद बुरा संकेत दे रहा है। यह महज एक कड़ा नहीं, बल्कि समाज के भविष्य पर किया जा रहा कड़ा प्रहार है। प्रशासन को हथियारों की श्रेणी में आने वाले इन भारी और धारदार कड़ों की बिक्री और सार्वजनिक प्रदर्शन पर कड़ी निगरानी रखने की जरूरत है।