काली कमाई का किला: किशनगंज में डीएसपी-इंस्पेक्टर पर शिकंजा, लेकिन सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार पर बड़े सवाल? डीजीपी ईमानदार, गिनती भर आईपीएस भी ईमानदार लेकिन कई एसपी, डीआईजी भ्रष्ट??
काली कमाई का किला: किशनगंज में डीएसपी-इंस्पेक्टर पर शिकंजा, लेकिन सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार पर बड़े सवाल? डीजीपी ईमानदार, गिनती भर आईपीएस भी ईमानदार लेकिन कई एसपी, डीआईजी भ्रष्ट??
काली कमाई का किला: किशनगंज में डीएसपी-इंस्पेक्टर पर शिकंजा, लेकिन सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार पर बड़े सवाल? डीजीपी ईमानदार, गिनती भर आईपीएस भी ईमानदार लेकिन अब भी कई एसपी और डीआईजी भ्रष्ट??
दस्तक 7मीडिया/संजय कुमार राय
किशनगंज जिले में डीएसपी और इंस्पेक्टर के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की कार्रवाई ने पूरे पुलिस महकमे में हलचल मचा दी है। इस कार्रवाई ने सिर्फ दो अधिकारियों की काली कमाई को उजागर नहीं किया, बल्कि राज्य में फैले व्यापक भ्रष्टाचार पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, जांच के दायरे में आए 1994 बैच के डीएसपी ने करीब 100 करोड़ रुपये और 2009 बैच के इंस्पेक्टर ने कम ही दिनों में लगभग 50 करोड़ रुपये की संपत्ति खड़ी कर ली। यह संपत्ति केवल वेतन से संभव नहीं, बल्कि कथित तौर पर अवैध उगाही और भ्रष्टाचार का नतीजा है। बिहार में सिर्फ ये दो नहीं बल्कि अनगिनत पुलिस पदाधिकारी हे जिन्हें आय से अधिक की संपत्ति हे बस इन्हें आर्थिक अपराध इकाई को खोजना हे ।
“थानों की बोली” और फिक्स मासिक सिस्टम ?
राज्य के कई जिलों में थानों की पोस्टिंग को लेकर चौंकाने वाली बातें सामने आती रहती हैं। सूत्रों का दावा है कि कुछ जगहों पर थानों की अप्रत्यक्ष “नीलामी” होती है। एक तरीका: मोटी रकम लेकर थाने की पोस्टिंग देना ,दूसरा तरीका: थाने के हिसाब से मासिक फिक्स रकम तय करना और इसके पीछे पुलिस पदाधिकारियों के दलाल सिपाही या अन्य पुलिस कर्मी होते हे, और ऐसे दलाल पुलिस कर्मी भी करोड़ों के मालिक बन जाते हे ?
दारूबंदी के बाद यह खेल और तेज हो गया है। शराब माफियाओं से पुलिस को नियमित मासिक वसूली मिलने के आरोप लगते रहे हैं। बड़े शराब खेप की बरामदगी भी अक्सर मद्य निषेध विभाग पटना से मिली सूचना के बाद ही होती है, जिससे स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के संदेह गहराते हैं। सबसे बड़ी बात हे कि इस धंधे में जुड़े कथित रूप से ड्राइवर चालक तो जेल की हवा खा लेते हे लेकिन मुख्य तस्कर का पता पुलिस नहीं लगा पाती हे सूत्र बताते हैं इसके पीछे भी बड़ा खेल हे।
बॉर्डर इलाकों में “काली कमाई” का बड़ा खेल
किशनगंज ही नहीं नेपाल से सटे कई सीमावर्ती जिलों में गो-तस्करी और शराब तस्करी से भारी अवैध कमाई का नेटवर्क चलने की बात सामने आती रहती है। यही वजह है कि कई अधिकारी कम समय में ही अकूत संपत्ति के मालिक बन जाते हैं। कुछ माह पहले कई आईपीएस का प्रमोशन एसपी से डीआईजी में हुआ और इनका पदस्थापन हो गया, मजेदार बात यह रहा कि जब एसपी का डीआईजी में अधिसूचना जारी हो गया तो कुछ एसपी ने कई सब इंस्पेक्टर/इंस्पेक्टर का आनन फानन में अलग अलग थानों में पोस्टिंग कर दिया, ऐसे में इनकी कार्यशैली का पता चलता हे ? अब ऐसे एसपी को सरकार ने क्षेत्र के डीआईजी का जिम्मा दे दिया फिर क्षेत्र में क्या ये हरे रामा हरे कृष्णा करेंगे, कि कार्यशैली वही रहेगी? कार्यालय में ही कई अप्रत्यक्ष रूप से पुलिसकर्मी हे जो मामले का निपटारा कर आदान प्रदान करते हे ?
पटना में बेनामी/नामी संपत्ति का जाल
अन्य जिलों को छोड़ भी दे सिर्फ राजधानी पटना में तेजी से बढ़ रहे अपार्टमेंट और जमीन की खरीद-फरोख्त को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि इन संपत्तियों में बड़ी हिस्सेदारी भ्रष्टाचार से अर्जित काले धन की है, जो बेनामी और नामी निवेश के रूप में लगाया जा रहा है जो ज्यादातर सरकारी कर्मचारी/पदाधिकारी हे ।
सिर्फ पुलिस ही नहीं, कई विभाग सवालों के घेरे में
भ्रष्टाचार की यह कहानी केवल पुलिस विभाग तक सीमित नहीं है।प्रशासनिक महकमे में भी कई विभागों पर उंगली उठ रही है इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा,राजस्व, बिजली, नगर निगम आदि कई विभाग के छोटे/बड़े यहां तक कि शीर्ष पर बैठे अधिकारी हे ।सूत्रों का कहना है कि यदि आर्थिक अपराध इकाई इन विभागों की गहराई से जांच करे, तो “पैसे की बारिश” का बड़ा खुलासा हो सकता है और प्रशासनिक महकमें का अवैध वसूली पुलिस विभाग के अधिकारियों से कई गुना ज्यादा हे?
नए दरोगाओं में भी “जल्दी अमीर बनने” की होड़
हाल के वर्षों में भर्ती हुए कई नए दरोगाओं की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कुछ युवा पुलिस अधिकारी कम समय में ही करोड़पति बनने की मानसिकता के साथ काम कर रहे हैं, जिससे सिस्टम में भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी हो रही हैं। यही नहीं कई अनुमंडल के डीएसपी के बारे में यहां तक कहा जा रहा हे कि अब घटनाओं का स्थल निरीक्षण करते नहीं, ऑफिस में ही वादी और आरोपी पक्ष को बारी बारी से बुलाकर बयान दर्ज करते हे,और पर्यवेक्षण टिप्पणी निकाल देते हे इस पर्यवेक्षण टिप्पणी निकालने में भी बड़ा खेल पैसों का होता हे यही नहीं कई एसपी भी घटना स्थल का निरीक्षण करते नहीं हे और डीएसपी के पर्यवेक्षण पर ही मुहर लगा देते हे । कई ऐसे कार्य रूप हे जो पुलिस विभाग के उच्च पदों पर बैठे पुलिस पदाधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठते रहे हैं।
सिस्टम बचा है, क्योंकि बड़े कुर्सी पर बैठे अब भी हैं कई ईमानदार
हालांकि, यह भी सच है कि पूरे सिस्टम को भ्रष्ट कहना सही नहीं होगा। कई ईमानदार अधिकारी आज भी अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। उन्हीं के कारण व्यवस्था किसी तरह संतुलित बनी हुई है।
किशनगंज की कार्रवाई एक संकेत है ,लेकिन क्या यह सिर्फ शुरुआत है?
अगर आर्थिक अपराध इकाई पूरे सिस्टम की निष्पक्ष जांच करे, तो भ्रष्टाचार की दल- दल में ज्यादातर पदाधिकारी डूबते नजर आयेंगे और इतनी अकूत संपत्ति का पता चलेगा जहां बिहार सरकार का सालाना बजट कम पर जाए और यह कई परतें खुल सकती हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई व्यापक सफाई अभियान में बदलेगी, या फिर कुछ मामलों तक ही सीमित रह जाएगी? इसी भ्रष्टाचार का अंश हे किशनगंज डीएसपी और इंस्पेक्टर।