प्रशासनिक आश्वासन और सुरक्षा की कसौटी,गौड़ाबौराम हादसे ने उठाए सिस्टम पर गंभीर सवाल
प्रशासनिक आश्वासन और सुरक्षा की कसौटी,गौड़ाबौराम हादसे ने उठाए सिस्टम पर गंभीर सवाल
प्रशासनिक आश्वासन और सुरक्षा की कसौटी,गौड़ाबौराम हादसे ने उठाए सिस्टम पर गंभीर सवाल
दस्तक 7 मिडिया,उत्तम सेनगुप्ता।
घनश्यामपुर थाना क्षेत्र के बगंराहठा-बिरौल मुख्य मार्ग पर एक दिन पूर्व दिल्ली पब्लिक स्कूल की मैजिक वाहन का जलकुंभी से भरी खाई में पलटना मात्र एक दुर्घटना नहीं, बल्कि स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर बरती जा रही व्यापक लापरवाही का एक और चेतावनी भरा अध्याय है। इस घटना के बाद सरकारी तंत्र सक्रिय तो हुआ है, लेकिन अधिकारियों द्वारा ‘जांच का आश्वासन’ क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोक पाएगा? यह एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि इस हादसे ने एक बार फिर शिक्षा विभाग और परिवहन विभाग की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहां एक तरफ विभागीय अधिकारी नियमों के उल्लंघन की जांच करने की बात कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्कूल प्रशासन अपनी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ता नजर आ रहा है।
हादसा स्कूली बच्चों की सुरक्षा और वाहनों के रखरखाव में होने वाली गंभीर कोताही की ओर स्पष्ट इशारा करता है। सिर्फ जांच की बात करना काफी नहीं है, बल्कि सिस्टम में आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता है। इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अभिभावकों की है। विशेषज्ञों का कहना है कि बात केवल स्कूल की फीस भरने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। क्या आपके बच्चे को ले जाने वाला वाहन परिवहन विभाग के मानकों को पूरा करता है? वाहन चालक का अनुभव और उसका चरित्र कैसा है?
क्या स्कूल प्रशासन सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कर रहा है? चूंकि अभिभावक अपनी मेहनत की कमाई बच्चों के भविष्य पर निवेश करते हैं, इसलिए उनकी चुप्पी और असावधानी ही अक्सर स्कूल प्रबंधनों के मनोबल को बढ़ाती है।
घटना पर संज्ञान लेते हुए जिला शिक्षा पदाधिकारी, विद्यानंद ठाकुर ने स्पष्ट किया है कि निजी स्कूलों में संचालित गाड़ियां किसी भी सूरत में परिवहन विभाग के निर्धारित मानदंडों से बाहर नहीं होनी चाहिए।
परिवहन नियमों के अनुसार अनिवार्य मानक–
वाहनों का वैध फिटनेस प्रमाण पत्र और बीमा।
अनुभवी चालक और अनिवार्य रूप से एक हेल्पर।
स्पीड गवर्नर और इमरजेंसी एग्जिट की उपलब्धता।
क्षमता से अधिक बच्चों का न बैठना।
विभागीय अधिकारियों के आश्वासन कितने कारगर साबित होंगे, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन फिलहाल यह घटना एक ‘वेक-अप कॉल’ है। जब तक स्कूल प्रशासन को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा और अभिभावक स्वयं सुरक्षा मानकों की जांच नहीं करेंगे, तब तक मासूमों की जान दांव पर लगी रहेगी।