एलपीजी कॉमर्शियल पर सख्ती का असर, होटलों में फिर धधकने लगे कोयले के चूल्हे

दस्तक7मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा।

सरकार द्वारा कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के उपयोग को लेकर बढ़ती सख्ती और बदलती गाइडलाइंस के बीच बाजार की सूरत बदलने लगी है। चाय-नाश्ता,भोजन बेचने वाले छोटे बड़े दुकानदारों और होटल मालिकों ने अब गैस के विकल्प के रूप में पारंपरिक कोयले के चूल्हों को अपनाना शुरू कर दिया है। होटल मालिकों का कहना है कि कमर्शियल गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव और हालिया प्रशासनिक निर्देशों के बाद सिलेंडर का उपयोग उनके बजट से बाहर हो रहा है। वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर अब सुबह होते ही सड़कों के किनारे गैस बर्नर की जगह कोयले की अंगीठियां जलती हुई दिखाई दे रही हैं। स्थानीय दुकानदारों ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि गैस की तुलना में कोयले का उपयोग खर्च को लगभग 30-40% तक कम कर देता है।
कई ग्राहकों का मानना है कि कोयले की धीमी आंच पर बनी चाय और नाश्ते का स्वाद गैस चूल्हे से बेहतर होता है। कमर्शियल सिलेंडर पर बढ़ती सख्ती के बाद हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। धुआं जरूर होता है, लेकिन दुकान चलाने के लिए कोयला ही अब एकमात्र सहारा है। हालांकि यह बदलाव व्यापारियों के लिए राहत भरा हो सकता है।

प्रशासन की सख्ती ने छोटे व्यापारियों को पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर कर दिया है। जहां आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए हम गैस और बिजली पर निर्भर हो रहे थे, वहीं आर्थिक दबाव ने एक बार फिर ‘कोयला युग’ की वापसी करा दी है। अब देखना यह है कि प्रशासन प्रदूषण नियंत्रण और व्यापारियों की जीविका के बीच क्या संतुलन बनाता है।