“रसूख के आगे क्यों ठहर जाता है कानून? दरभंगा में कार्रवाई पर उठने लगे दोहरे मापदंड के सवाल”
दस्तक 7मीडिया/दरभंगा
दरभंगा में कानून व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शहर और जिले के कई मामलों में यह देखने को मिला है कि प्रभावशाली और रसूखदार लोगों के सामने कानून की धाराएं मानो विराम ले लेती हैं, जबकि आम लोगों पर कार्रवाई तेज और सख्त हो जाती है। इससे न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन व्यक्तियों की पहुंच नेताओं, जनप्रतिनिधियों या वरीय पुलिस अधिकारियों तक होती है, उनके खिलाफ दर्ज शिकायतों पर अक्सर कार्रवाई ठंडी पड़ जाती है। कई मामलों में पुलिस जांच की रफ्तार धीमी हो जाती है या फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, जिन लोगों के पास कोई सिफारिश या रसूख नहीं होता, उन्हें छोटी-छोटी बातों में भी कानूनी प्रक्रियाओं और परेशानियों से गुजरना पड़ता है।
लोगों का कहना है कि यह स्थिति कानून के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ है, जिसमें सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान न्याय की बात कही गई है। सवाल उठ रहा है कि जब संविधान और कानून की नजर में सभी बराबर हैं, तो फिर कार्रवाई के पैमाने अलग-अलग क्यों दिखते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि यदि कानून का पालन निष्पक्ष तरीके से नहीं होगा, तो आम लोगों का भरोसा व्यवस्था से कमजोर पड़ सकता है। ऐसे में जरूरत है कि प्रशासन और पुलिस निष्पक्षता के साथ हर मामले में समान रूप से कार्रवाई करे, ताकि यह संदेश जाए कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति बड़ा या छोटा नहीं है।
फिलहाल दरभंगा में उठ रहे ये सवाल प्रशासन के लिए एक चुनौती बनते जा रहे हैं—क्या कानून सच में सबके लिए बराबर है, या फिर रसूख के आगे इसकी धार कुंद पड़ जाती है?
