अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महज़ एक दिन का औपचारिक जश्न नहीं है; यह एक संकल्प है— नारी शक्ति, परंपरा की बेड़ियों से नेतृत्व के शिखर तक बदलता भारत ‘अवला’ से ‘अपराजिता’ तक का सफर
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महज़ एक दिन का औपचारिक जश्न नहीं है; यह एक संकल्प है— नारी शक्ति, परंपरा की बेड़ियों से नेतृत्व के शिखर तक बदलता भारत ‘अवला’ से ‘अपराजिता’ तक का सफर
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महज़ एक दिन का औपचारिक जश्न नहीं है; यह एक संकल्प है—
नारी शक्ति, परंपरा की बेड़ियों से नेतृत्व के शिखर तक बदलता भारत ‘अवला’ से ‘अपराजिता’ तक का सफर
दस्तक7मिडिया,डॉ. सुस्मिता कुमारी , मुंगेर।
आज 8 मार्च है, सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि उस आधी आबादी के अदम्य साहस, संघर्ष और सफलता के उत्सव का दिन है, जो दुनिया को गढ़ती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महज़ एक दिन का औपचारिक जश्न नहीं है; यह एक संकल्प है—महिलाओं के आत्मसम्मान, समान अधिकारों और उनके अटूट सामर्थ्य को स्वीकार करने का।
भारतीय समाज में एक युगांतरकारी परिवर्तन आ रहा है। कल तक जिन्हें ‘अवला’ और ‘आश्रित’ समझा जाता था, आज वे आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा लिख रही हैं।
फाइटर जेट उड़ाने से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम संभालने तक, भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी मेधा का लोहा मनवा रही हैं।
छोटे गांवों की महिला उद्यमी से लेकर विज्ञान (ISRO) के जटिल मिशनों तक, उनकी भागीदारी देश की जीडीपी और गौरव दोनों को बढ़ा रही है। नीति निर्धारण और शासन में महिलाओं की बढ़ती सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि वे अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि देश की नियति तय करने वाली ‘भाग्यविधाता’ हैं।
सफलता की इन कहानियों के बीच हमें उन कड़वी सच्चाइयों को भी स्वीकार करना होगा जो आज भी प्रगति की राह में बाधा हैं। सामाजिक सोच– आधुनिकता के बावजूद, पितृसत्तात्मक मानसिकता और रूढ़ियां आज भी महिलाओं की उड़ान को सीमित करने का प्रयास करती हैं। कार्यस्थल पर समान वेतन और सार्वजनिक स्थानों पर निर्भय होकर घूमने की स्वतंत्रता अब भी एक बड़ा लक्ष्य है।
दोहरा बोझ- पेशेवर सफलता के साथ-साथ घरेलू जिम्मेदारियों का असंतुलित बोझ महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है।
दस्तक7मिडिया परिवार के माध्यम से समाज के लिए एक संदेश–क्या करना होगा?
एक न्यायपूर्ण समाज वही है जहां अवसर ‘लिंग’ देखकर नहीं, बल्कि ‘योग्यता’ देखकर दिए जाएं। हमें महिलाओं को सिर्फ “सशक्त” बनाने की जरूरत नहीं है, बल्कि एक ऐसा सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण बनाने की जरूरत है जहां उनकी शक्ति को दबाया न जाए।”जब आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं, तो आप एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं; लेकिन जब आप एक महिला को शिक्षित करते हैं, तो आप पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ियों को सशक्त बनाते हैं।”
महिला सशक्तिकरण कोई दान या उपकार नहीं है, बल्कि यह एक सभ्य समाज का मौलिक अधिकार और आवश्यकता है। आइए, इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम न केवल उनकी उपलब्धियों पर ताली बजाएं, बल्कि अपने घरों और कार्यस्थलों पर उन्हें वह सम्मान और बराबरी दें, जिसकी वे हकदार हैं।