बिरौल मौत की ‘मंडी’ बने कुछ निजी अस्पताल? मासूमों की जान से ज्यादा ‘नोटों’ की अहमियत,
बिरौल मौत की ‘मंडी’ बने कुछ निजी अस्पताल? मासूमों की जान से ज्यादा ‘नोटों’ की अहमियत,
बिरौल मौत की ‘मंडी’ बने कुछ निजी अस्पताल? मासूमों की जान से ज्यादा ‘नोटों’ की अहमियत,
दस्तक7मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा।
मानवता को शर्मसार और चिकित्सा जगत को कलंकित करने वाली खबरें अब बिरौल में कुछेक को छोड़कर कई निजी अस्पतालों की पहचान बनती जा रही हैं। ताजा मामला नगर पंचायत बिरौल के वनदेवी नगर स्थित एक निजी शिशु रोग अस्पताल का है, जहां महज चार दिन के नवजात की मौत ने स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र की कलई खोल कर रख दी है। आरोप है कि यहां इलाज नहीं, बल्कि ‘वसूली’ का खेल चल रहा था, जिसकी परिणति एक बेगुनाह जान के रूप में हुई। वनदेवी नगर, कॉलेज रोड, पुराना थाना चौक से विशनपुर जाने वाली रोड—ये इलाके अब निजी अस्पतालों के ‘हब’ बन चुके हैं। विभागीय जानकारों का दावा है कि इन अस्पतालों के संचालकों के लिए सरकारी मापदंड रद्दी के टुकड़े के बराबर हैं। विभागीय अधिकारियों की ‘मौन स्वीकृति’ और कथित ‘ऊपरी मैनेजमेंट’ के दम पर यहां नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सूत्रों और जानकारों की मानें तो इन निजी शिशु अस्पतालों में संचालकों का एकमात्र उद्देश्य ‘अधिकतम कमाई’ होता है। इस चक्कर में वे इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को नजरअंदाज कर देते हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टरों के बजाय अप्रशिक्षित कर्मियों से काम लेना। गुमराह करने की रणनीति, परिजनों को बच्चे की स्थिति के बारे में डराकर या झूठी उम्मीदें देकर लाखों का बिल बनाना। सुरक्षा मानकों का अभाव, आग से सुरक्षा से लेकर बायो-मेडिकल वेस्ट तक के नियमों की अनदेखी।
सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि जब भी कोई अनहोनी होती है, तो प्रशासन की ओर से ‘जांच’ का आश्वासन तो मिलता है, लेकिन वह फाइल कभी धरातल पर नहीं उतरती। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ‘अर्थ मैनेजमेंट’ के इस खेल में रसूखदार संचालकों और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों का गठबंधन इतना मजबूत है कि मामले को ठंडे बस्ते में डालने में देर नहीं लगती। क्या स्वास्थ्य विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? वनदेवी नगर के शिशु अस्पताल में हुई नवजात की मौत के बाद क्या संचालक पर कोई ठोस कार्रवाई होगी, या फिर से ‘मैनेजमेंट’ के पर्दे के पीछे सच को दफन कर दिया जाएगा?