कुशेश्वरस्थान का हरीनगर, सन्नाटे में खोया भाईचारा, अब पुलिस के भरोसे से ज्यादा विश्वास बहाली की दरकार
कुशेश्वरस्थान का हरीनगर, सन्नाटे में खोया भाईचारा, अब पुलिस के भरोसे से ज्यादा विश्वास बहाली की दरकार
कुशेश्वरस्थान का हरीनगर, सन्नाटे में खोया भाईचारा, अब पुलिस के भरोसे से ज्यादा विश्वास बहाली की दरकार
दस्तक7मिडिया, बिरौल, दरभंगा।
जिस मिट्टी की पहचान कभी आपसी प्रेम, सद्भाव और सांझी संस्कृति से होती थी, आज वहां की हवाओं में डर और अविश्वास का जहर घुल गया है। कुशेश्वरस्थान का हरीनगर गांव, जो कभी अमन-चैन की मिसाल था, आज अशांति और भय के साये में है। स्थिति यह है कि पुलिसिया कार्रवाई के खौफ से एक समुदाय के लोग अपने घरों में ताला लगाकर पलायन करने को मजबूर हैं।
हालांकि, प्रशासन के वरीय अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में आश्वासन दिया है कि किसी भी निर्दोष या पढ़ाई करने वाले छात्र के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। लेकिन धरातल पर यह आश्वासन काम आता नहीं दिख रहा। जानकारों का कहना है कि 30 जनवरी 2026 को जब एक पक्ष ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी, तब अगर पुलिस समय रहते सक्रिय होती, तो शायद आज यह नौबत न आती। क्षेत्र में आज भी चर्चा है कि घटना के छह दिन बीत जाने के बाद भी सन्नाटा पसरना चिंता का विषय बना हुआ है। जो जनप्रतिनिधियों की ‘प्रतीक्षा करो’ वाली नीति पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह मामला अब स्थानीय विवाद से निकलकर राजनीतिक रंग लेने लगा है। जब गांव को मरहम की जरूरत थी, तब आरोप-प्रत्यारोप के दौर ने दरार को और गहरा कर दिया है।
स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष तक के किसी बड़े नेता ने अब तक हरीनगर का रुख नहीं किया।
आक्रोश को मिटाने और दोनों समुदायों को एक मेज पर बिठाने की कोई ठोस पहल अब तक राजनीतिक या सामाजिक स्तर पर नहीं हुई है, आखिर क्यों ?
हरीनगर को फिर से वही पुराना हरीनगर बनाने के लिए केवल पुलिस की गश्त काफी नहीं है, बल्कि सभी समुदाय के गणमान्य लोगों को प्रशासन के साथ मिलकर शांति समिति की बैठकें तेज करनी चाहिए।
पुलिस को अपनी कार्रवाई में पारदर्शिता लानी होगी ताकि निर्दोषों के मन से भय खत्म हो और वे वापस अपने घरों को लौट सकें।
स्थानीय नेताओं को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर गांव में भाईचारे का संदेश देना होगा। जो नहीं हो पा रहा है।
दीवारें खड़ी करना आसान है, लेकिन उन पर पुल बनाना मुश्किल। हरीनगर के भविष्य के लिए दोनों समुदायों को यह समझना होगा कि विकास और शांति एक-दूसरे के पूरक हैं। डर की वजह से छोड़े गए घर वापस तभी बसेंगे, जब पड़ोसी अपने पड़ोसी को सुरक्षा का अहसास दिलाएगा।
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