दरभंगा में पुलिस का मनोबल रसातल में: कार्रवाई के डर से थानेदारी ठप, वायरल वीडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल
दरभंगा में पुलिस का मनोबल रसातल में: कार्रवाई के डर से थानेदारी ठप, वायरल वीडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल
दरभंगा में पुलिस का मनोबल रसातल में: कार्रवाई के डर से थानेदारी ठप, वायरल वीडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल
दस्तक 7मीडिया /दरभंगा
दरभंगा जिले में कानून-व्यवस्था को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर उभरकर सामने आ रही है। आम लोगों के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि जिले में पुलिस का इकबाल कमजोर पड़ चुका है। हालात यह हैं कि सार्वजनिक स्थलों पर पुलिसकर्मियों से बहस, आरोप-प्रत्यारोप और दबाव की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, जबकि पुलिस कई मौकों पर मूकदर्शक बनी नजर आती है।
ताजा मामला दरभंगा के दिल्ली मोड़ से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां एक वायरल वीडियो में दो युवक सदर थानाध्यक्ष पर मां-बहन की गाली देने का आरोप लगाते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में थानाध्यक्ष सफाई देते नजर आते हैं कि उन्होंने कोई गाली नहीं दी है और इसके बाद वे वहां से हटते हुए दिखाई पड़ते हैं। हालांकि इस वायरल वीडियो की आधिकारिक पुष्टि ‘दस्तक 7’ द्वारा नहीं की गई है, लेकिन वीडियो ने जिले में पुलिस के मनोबल और कार्यशैली पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
बेता थानाध्यक्ष प्रकरण के बाद बदला माहौल
जानकारों का मानना है कि बेता थानाध्यक्ष पर हुई त्वरित कार्रवाई के बाद पुलिस महकमे में भय और असमंजस का माहौल बन गया है। पुलिसकर्मी दबे स्वर में यह कहते सुने जा रहे हैं कि अब वे कर्तव्य निभाने से पहले दस बार सोचते हैं ,कहीं शब्दों की गलत व्याख्या कर उनके खिलाफ कार्रवाई न हो जाए।
यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि गाली-गलौज का आरोप लगाकर पुलिस के मनोबल को गिराया जा रहा हें । सवाल यह भी है कि बेता थाना पुलिस पर यदि पुलिसकर्मी की गलती पर कार्रवाई जरूरी थी, तो उसी प्रकरण में शामिल अन्य जिम्मेदारों यानि महिला चिकित्सक की कथित भूमिका पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अब इस धारणा ने पुलिस बल के भीतर असंतोष को और गहरा किया है।
“पुलिस पर ही कार्रवाई क्यों?”
पुलिस महकमे के भीतर यह भावना मजबूत हो रही है कि हर मामले में कठोर कार्रवाई का दंड सिर्फ पुलिस को ही क्यों भुगतना पड़े। जिन नागरिकों या अन्य विभागीय कर्मियों की भूमिका संदिग्ध बताई जाती है, उन पर कार्रवाई न होने से संदेश गलत जाता है ,और इसका सीधा असर फील्ड में तैनात पुलिसकर्मियों के आत्मविश्वास पर पड़ता है।एक दिन पहले नौ इंट्री में गाड़ी लेकर घुस गया ,पुलिस ने रोका तो वह पुलिस से भीड़ गया और कहा कि सड़क में नौ इंट्री का बोर्ड कहाँ हें ,जबकि सबको पता हें कि नौ इंट्री किन किन सड़कों पर लगा हुआ हें और इसे जवाबदेही पूर्वक निर्वहन करना हें।
बड़ा सवाल: कानून का इकबाल कैसे लौटे?
विशेषज्ञों का मानना है कि कानून-व्यवस्था केवल कार्रवाई से नहीं, बल्कि संतुलित और निष्पक्ष निर्णय से मजबूत होती है। यदि पुलिस हर समय कार्रवाई के डर में रहेगी और दूसरी ओर दोषियों पर समान रूप से कदम नहीं उठेंगे, तो इसका खामियाजा पूरे जिले को भुगतना पड़ेगा।अब निगाहें जिला प्रशासन और पुलिस मुख्यालय पर हैं,क्या पुलिस का मनोबल बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, या फिर यह गिरावट जिले की कानून-व्यवस्था को और कमजोर करती जाएगी?
वहीं कानून के कुछ जानकर कहते हें कि अगर कानून से देश चलता तो फिर पुलिस की क्या जरूरत हें।हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन आखिर कौन कराता हें ,पुलिस।अगर पुलिस गलत मंशा रखने वाले, कानून का उल्लंघन करने वाले ,अपराधी से हाथ मिला ले फिर कानून का राज स्थापित कैसे होगा ?
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