गाली पर निलंबन, फर्जी बोर्ड पर मेहरबानी! बेता थानाध्यक्ष प्रकरण ने दरभंगा पुलिस की कार्यप्रणाली पर खड़े किए गंभीर सवाल
गाली पर निलंबन, फर्जी बोर्ड पर मेहरबानी! बेता थानाध्यक्ष प्रकरण ने दरभंगा पुलिस की कार्यप्रणाली पर खड़े किए गंभीर सवाल
गाली पर निलंबन, फर्जी बोर्ड पर मेहरबानी! बेता थानाध्यक्ष प्रकरण ने दरभंगा पुलिस की कार्यप्रणाली पर खड़े किए गंभीर सवाल
दस्तक 7मीडिया /दरभंगा
आखिर बेता थानाध्यक्ष हरेंद्र कुमार का गुनाह क्या था? गुस्से में मुंह से एक गाली निकल गई—बस यही? वहीं शातिर दिमाग से बैठी एक महिला चिकित्सक ने उसी क्षण वीडियो बना लिया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करा दिया। नतीजा यह हुआ कि वरीय पुलिस अधीक्षक ने बिना देर किए थानाध्यक्ष को निलंबित कर दिया। कार्रवाई फुर्तीली थी, संदेश साफ था :ज़ीरो टॉलरेंस।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते, बल्कि यहीं से शुरू होते हैं। जिस महिला चिकित्सक की गाड़ी पर “भारत सरकार” लिखा फर्जी बोर्ड लगा था, उस पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं? फर्जी बोर्ड लगाकर खुलेआम चलना क्या अपराध नहीं? धोखाधड़ी की श्रेणी में आने वाला यह कृत्य पुलिस की नजरों से कैसे बच गया?
सबसे गंभीर सवाल उस क्षण का है जब अर्टिगा गाड़ी को पुलिस ने इंडिकेट किया, फिर भी चालक ने गाड़ी और तेज कर दी। हालात ऐसे बने कि थानाध्यक्ष समेत दो पुलिस कर्मियों को कूदकर अपनी जान बचानी पड़ी। चालक की मंशा क्या थी यह स्पष्ट नहीं थी? अगर उस वक्त किसी पुलिसकर्मी की मौत हो जाती तो क्या होता? शायद वही घिसा-पिटा बयान आता “इस दुख की घड़ी में पूरा पुलिस परिवार मृतक के परिवार के साथ खड़ा है।” कुछ दिन बाद सब भूल जाते, न कोई हालचाल, न कोई जिम्मेदारी।
बताया जाता है कि उक्त चिकित्सक नो-एंट्री को जानते-समझते हुए उसी रास्ते से बेधड़क जा रही थी, क्योंकि गाड़ी पर भारत सरकार का बोर्ड लगा था। इसी बोर्ड के सहारे कितने टोल टैक्स बचाए गए होंगे? यह सीधी-सीधी धोखाधड़ी है, जिसमें सरकार के हजारों-लाखों रुपये अप्रत्यक्ष रूप से हड़प लिए गए। इसके बावजूद प्राथमिकी दर्ज नहीं होना जिला पुलिस की मंशा पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
यही गलती कोई आम आदमी कर दिया रहता तो सभी कारवाई अब तक पूरी हो गई होती ?रसूख और आम में यही फर्क हें।
दरभंगा पुलिस आखिर रसूखदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं करती? डॉक्टर अगर शराब पीते पुलिस की नजर में आ जाए, दारू के साथ पकड़ा जाए ,तो भी कार्रवाई नहीं।ऐसा एक मामला बेता थाना में ही दर्ज हुआ और अनुमंडल स्तर के एक पुलिस अधिकारी ने लीपा पोती कर दी क्यों ?क्यूंकि सभी डॉक्टर थें।
वहीं आम आदमी पर नजर पड़ते ही सलाखों के पीछे! किसी स्कूल में बच्चे की संदिग्ध मौत हो जाए तो उसे आत्महत्या बता दिया जाता है। मुख्यमंत्री के आगमन पर कोई पुलिसकर्मी ईमानदारी से ड्यूटी निभाए तो वह “गालीबाज दारोगा” कहलाता है, और जो फर्जी बोर्ड लगाकर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए पुलिस पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश करे, वह “माता दुर्गा” बन जाती है!
यह कैसी पुलिस की न्याय व्यवस्था है? क्यों पुलिस रसूखदारों के सामने सिर झुकाती है? जब तराजू का पलड़ा ताकत और ओहदे के हिसाब से झुके, तब बेहतर पुलिसिंग की बात आखिर कैसे की जा सकती है? यह मामला सिर्फ एक थानाध्यक्ष के निलंबन का नहीं बल्कि कानून के समान उपयोग और पुलिस की निष्पक्षता की साख का हें जिसका जवाब अब तक अधूरा हें।
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