पटोरी गांव का वह खूनी पोखरा: 8 अगस्त 1994 की शाम, जब गोलियों से थर्रा उठा पूरा इलाका

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय 

पटोरी गांव का यह पोखरा आज भी खामोश है, लेकिन इसकी खामोशी में छुपी है करीब 32 साल पुरानी वह दहला देने वाली दास्तान, जो आज भी गांव वालों के दिल-दिमाग में जिंदा है। यह वही जगह है, जहां 8 अगस्त 1994 की शाम अचानक ताबड़तोड़ गोलियों की गूंज ने पूरे इलाके को दहशत में झोंक दिया था।

उस दिन भोले-भाले किसान रोज़ की तरह अपने पशुओं को लेकर पोखरा पर आए थे। किसी को अंदेशा तक नहीं था कि यह शाम उनके जीवन की सबसे भयावह शाम बन जाएगी। पशुओं को स्नान कराकर जब वे लौट रहे थे, तभी अचानक गोलियों की बौछार शुरू हो गई। पग-डंडी देखते ही देखते खून से लाल हो गई।
गोलियों की आवाज़ के साथ चीख-पुकार गूंज उठी। लोग समझ ही नहीं पाए कि क्या हो रहा है। कोई गिरा, कोई उठकर भागा, कोई अपनों को ढूंढता रहा।

शाम के करीब सात बजे हुए इस नरसंहार ने पूरे गांव को हिला दिया। गोलियों की आवाज सुनते ही आसपास के लोग जान बचाकर पोखरा की ओर दौड़े। वहां का मंजर दिल दहला देने वाला था।खून से लथपथ लोग ज़मीन पर पड़े कराह रहे थे। किसी तरह सभी घायलों को दरभंगा के अस्पताल पहुंचाया गया, एक ने अस्पताल में पहुंचने के कुछ देर बाद दम तोड़ा तो कुछ दिन बाद दूसरे घायल की भी सांसें थम गईं।
इस हमले में कुल नौ लोगों को गोलियां लगी थीं।

उस रात पटोरी गांव में कोई सो नहीं पाया। हर घर में मातम पसरा था। महिलाएं रोती रहीं, बच्चे सहमे रहे और पुरुषों की आंखों में गुस्सा, डर और बेबसी एक साथ तैरती रही। चारों तरफ दहशत का माहौल था—हर आहट पर लोग चौंक जा रहे थे।

आज 32 साल बाद भी जब कोई उस पोखरा के पास से गुजरता है, तो कानों में मानो फिर से गोलियों की आवाज गूंजने लगती है। वह भयावह शाम, वह खून से सनी पग-डंडी और वह चीख-पुकार,सब कुछ आज भी गांव की स्मृतियों में जिंदा है।
पटोरी गांव का यह पोखरा सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि उस दर्द और डर का गवाह है, जिसे गांव आज तक भूल नहीं पाया।