32 साल बाद न्याय का प्रहार: पटोरी नरसंहार में दोषियों को उम्रकैद, अदालत के फैसले से कांपा गांव का अन्याय,और देर से ही सही मिला न्याय।गांव के लोग मना रहें हें जश्न और कहते हें रावण रूपी अपराधी का जरूर होगा अंत।न्याय ने दी दस्तक ,इतिहास ने बदली करवट।

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय 

हर युग में रावण प्रवृत्ति के लोगों का अंत तय रहा है, क्योंकि हर युग में राम-रूपी न्याय की भी वापसी होती है। कुछ ऐसा ही दृश्य दरभंगा जिले के पटोरी गांव में देखने को मिला, जहां 32 वर्षों बाद न्याय ने दस्तक दी और इतिहास ने करवट बदली।

करीब तीन दशक तक न्याय की राह ताकते रहे पटोरी गांव के लोगों को आखिरकार वह दिन देखने को मिला, जब सिविल कोर्ट दरभंगा के अपर सत्र न्यायाधीश सुमन कुमार दिवाकर की अदालत ने चर्चित पटोरी हत्याकांड में ऐतिहासिक और साहसिक फैसला सुनाया। अदालत ने दो वरीय अधिवक्ताओं सहित पांच दोषियों को आजीवन सश्रम कारावास तथा 05-05 लाख रुपये अर्थदंड की सजा सुनाकर यह साफ कर दिया कि कानून के सामने न तो रसूख चलता है और न ही समय की धूल।

यह फैसला सिर्फ एक सजा नहीं, बल्कि उस भरोसे की वापसी है जो वर्षों से टूटता चला आ रहा था। गांव के लोग एक स्वर में कह रहे हैं “न्याय पर भरोसा था, लेकिन बहुत देर से मिला। अगर न्याय रूपी भगवान का यहां पदार्पण नहीं होता, तो शायद यह मामला और कितने सालों तक लटकता रहता।”

मामला 8 अगस्त 1994 का है, जब पटोरी गांव में पशुपालकों पर पहले से घात लगाए अपराधियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इस निर्मम हमले में नौ लोग गोली से घायल हुए, जिनमें से दो की इलाज के दौरान मौत हो गई, जबकि सात लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे। तत्कालीन मुखिया के अनुसार, यह मिथिला का पहला और शायद आखिरी ऐसा नरसंहार था, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया था।

वर्षों तक मुकदमा चला, कई अभियुक्तों की मौत हो गई, कुछ फरार रहे, लेकिन अदालत ने साक्ष्यों, गवाहों और कानूनी पहलुओं की गहन समीक्षा के बाद न्याय का अंतिम अध्याय लिखा। सजा के साथ-साथ अदालत ने पीड़ित घायलों को मुआवजा देने का भी आदेश दिया, जो न्यायिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण है।

फैसले के बाद पटोरी गांव और आसपास के इलाकों में संतोष और सम्मान का माहौल है। ग्रामीण मानते हैं कि यह निर्णय केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, न्याय देर से सही, लेकिन होता जरूर है।

यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी और सीख है कि न्याय कभी मरता नहीं, और जो न्यायाधीश निष्पक्षता, साहस और विवेक के साथ निर्णय देता है, वही लोकतंत्र की असली रीढ़ होता है।

दस्तक 7मीडिया आगे के अंकों में इस खबर को और प्रमुखता से प्रकाशित करेगा और इस घटना के बारीकी बिंदुओं से अवगत कराएगा ,पढ़ते रहिये दस्तक 7मीडिया

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