30 साल बाद मिला न्याय: सिविल कोर्ट के आदेश पर नगर निगम ने तोड़ी दुकानें, परिवार को मिला बी.के. रोड तक रास्ता
30 साल बाद मिला न्याय: सिविल कोर्ट के आदेश पर नगर निगम ने तोड़ी दुकानें, परिवार को मिला बी.के. रोड तक रास्ता
30 साल बाद मिला न्याय: सिविल कोर्ट के आदेश पर नगर निगम ने तोड़ी दुकानें, परिवार को मिला बी.के. रोड तक रास्ता
दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा / विधि संवाददाता
सिविल कोर्ट, दरभंगा द्वारा पारित एक आदेश का अनुपालन कराने में करीब तीन दशक लग गए, लेकिन अंततः न्याय की जीत हुई। लक्ष्मीपुर मुहल्ला निवासी स्वर्गीय रविन्द्र नारायण चौधरी के आवास से बी.के. रोड तक आने-जाने के लिए रास्ता सुनिश्चित कराने संबंधी 30 वर्ष पुराने न्यायालयीन आदेश का पालन रविवार को कराया गया।
अपर सिविल जज-12 सलभ शर्मा की अदालत ने इजरायबाद संख्या 02/96 में दरभंगा नगर निगम के नगर आयुक्त, जिला दण्डाधिकारी एवं वरीय पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया था कि खेसरा संख्या 29496 पर निगम द्वारा निर्मित 35×42 फीट क्षेत्रफल की दुकानों को तोड़कर रास्ता बहाल किया जाए। न्यायालय के इसी आदेश के अनुपालन में नगर निगम की टीम दंडाधिकारी, पुलिस बल, कोर्ट के नाजीर एवं बुलडोजर के साथ बी.के. रोड पहुंची और रास्ते में बाधा बन रही निगम की दुकानों को तोड़कर जमींदोज कर दिया।
गौरतलब है कि रविन्द्र नारायण चौधरी ने अपने जीवनकाल में दरभंगा नगर निगम के विरुद्ध 12 फरवरी 1996 को पारित डिक्री के क्रियान्वयन हेतु 29 मार्च 1996 को इजरायबाद संख्या 02/96 दायर किया था। उन्होंने दखलदिहानी के लिए पुलिस बल, दंडाधिकारी एवं बुलडोजर की व्यवस्था हेतु नजारत में आवश्यक शुल्क भी जमा किया था।
न्यायालय द्वारा नियुक्त अधिवक्ता कमिश्नर ने जांचोपरांत 21 नवंबर 2025 को प्रतिवेदन सौंपते हुए स्पष्ट किया कि डिग्री होल्डर के परिवार के आवागमन के लिए अवरोध हटाना आवश्यक है। इसी के आधार पर अदालत ने कड़ा आदेश पारित किया।
इस बीच इजरायबाद दायर करने वाले रविन्द्र नारायण चौधरी का निधन हो गया, लेकिन उनके पुत्र—सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता केशव कुमार चौधरी एवं एक शिक्षक पुत्र—ने पूरी मुस्तैदी से न्यायालय और नगर निगम के चक्कर लगाते हुए आदेश के अनुपालन के लिए लगातार प्रयास जारी रखा। आखिरकार 18 जनवरी 2026 को 1996 में पारित आदेश का क्रियान्वयन संभव हो सका।
अब स्वर्गीय रविन्द्र नारायण चौधरी के परिजनों को अपने घर से बी.के. रोड तक आने-जाने का वैधानिक रास्ता मिल गया है। यह मामला न केवल न्यायिक दृढ़ता का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि देर से ही सही, कानून का राज अंततः स्थापित होता है।