डिजिटल शोर में गूंजती यादों की फ्रीक्वेंसी, दरभंगा के नंदु चौधरी और उनके 42 साल पुराने रेडियो की कहानी

दस्तक7मिडिया, उत्तम सेनगुप्ता, दरभंगा।

जहां आज की पीढ़ी हर छह महीने में मोबाइल फोन बदल लेती है, वहीं बिहार के दरभंगा जिले के लगमा ग्राम में एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने वक्त को थाम रखा है। नंदु चौधरी, जो पिछले 42 वर्षों से अपनी पसंदीदा फिलिप्स कंपनी के रेडियो को अपने कलेजे से लगाए हुए हैं। 1983 में खरीदा गया यह रेडियो उनके लिए महज एक उपकरण नहीं, बल्कि उनके जीवन के उतार-चढ़ाव का इकलौता गवाह है।
एक छोटी सी चाय की दुकान चलाने वाले नंदु चौधरी के लिए जीवन कभी आसान नहीं रहा। उन्होंने दस्तक7मिडिया के संवाददाता से बात करते हुए एक मर्मस्पर्शी बात कही— “एक चाय की दुकान चलाकर बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना कितना संघर्षपूर्ण होता है, यह केवल एक पिता ही समझ सकता है।”
जहां लोग महंगे स्मार्टफोन और भारी-भरकम डेटा पैक पर हजारों रुपए खर्च कर देते हैं, नंदु जी ने उस पैसे की बचत को अपने बच्चों के भविष्य में निवेश किया। उनके लिए रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि फिजूलखर्ची के खिलाफ एक संकल्प था।
आज जब दुनिया 5G की गति से भाग रही है, लोग नंदु जी के हाथ में बैटरी से चलने वाला पुराना रेडियो देखकर अक्सर चकित रह जाते हैं। लेकिन नंदु जी का तर्क बड़ा गहरा है।
मोबाइल रिचार्ज और रखरखाव का खर्च बचाकर उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई का बोझ उठाया।
उनके अनुसार, जमाने के साथ चलने का मतलब अपनी जड़ों और सादगी को भूल जाना नहीं है।
1983 से आज तक, प्रसारण की दुनिया बदल गई, कई स्टेशन बंद हो गए, लेकिन नंदु जी और उनके रेडियो का साथ आज भी बरकरार है।
नंदु चौधरी की कहानी हमें सिखाती है कि सुख-सुविधाओं का त्याग कर अपने बच्चों के सपनों को पंख देना ही असली पितृत्व है। उनका पुराना रेडियो उस त्याग का प्रतीक है, जो हर रोज बजता है और उन्हें याद दिलाता है कि ईमानदारी और सादगी की आवाज सबसे मधुर होती है।

लोग मोबाइल के युग में इसे अजूबा समझते हैं, पर मेरे लिए यह रेडियो मेरे बच्चों की डिग्री और उनके बेहतर भविष्य की नींव है— नंदु चौधरी