17 जनवरी को दरभंगा में होगा ‘न्याय का इम्तिहान’: नाबालिग दुष्कर्म कांड में डीआईजी की समीक्षा और आरोपी कथावाचक की ज़मानत पर होगी अहम बहस

दस्तक 7मीडिया /दरभंगा 

दरभंगा ज़िले के लिए 17 जनवरी 2026 यानि आज का दिन ऐतिहासिक और निर्णायक साबित होने वाला है। मामला एक नाबालिग बच्ची के साथ कथित दुष्कर्म से जुड़ा है, जिसकी प्राथमिकी महिला थाना, दरभंगा में पहले ही दर्ज की जा चुकी है। यह मामला न सिर्फ़ सामाजिक रूप से गंभीर है, बल्कि पॉक्सो अधिनियम जैसे सख़्त क़ानून के तहत दर्ज होने के कारण पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी कठघरे में है।

एक ओर जहाँ दरभंगा क्षेत्र के डीआईजी स्वयं इस मामले की समीक्षा करने वाले हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्य आरोपी कथावाचक की ज़मानत याचिका पर न्यायालय में सुनवाई होनी है। ऐसे में यह दिन प्रशासन, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था  तीनों के लिए परीक्षा की घड़ी मानी जा रही है।

पुलिस पर भी उठ रहें हे सवाल ,महिला थाना पुलिस ने आखिर क्यूँ बरती लापरवाही 

मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि

क्या महिला थानाध्यक्ष या अपर थानाध्यक्ष की कथित लापरवाही पर डीआईजी संज्ञान लेंगे?

क्या अनुसंधानकर्ता (IO) और अन्य पुलिस पदाधिकारी समीक्षा के दौरान अपनी कथित चूक को छिपाने के लिए “काग़ज़ी सफ़ाई” पेश करेंगे? क्या पीड़िता को समय पर न्याय दिलाने की दिशा में अनुसंधान निष्पक्ष और नियमसंगत रहा है?

सूत्रों की मानें तो प्रारंभिक स्तर पर अनुसंधान में देरी, धाराओं के निर्धारण और साक्ष्य संकलन को लेकर कई तरह की चर्चाएँ ज़िले में हैं, जिन्हें लेकर आम लोग और सामाजिक संगठनों में गहरी नाराज़गी है और कथावाचक और मौनी बाबा की गिरफ्तारी की मांग कर रहें हे।

डीआईजी के सामने बड़ी जिम्मेदारी

यह मामला नाबालिग से दुष्कर्म का है, जो सीधे तौर पर पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत आता है। ऐसे मामलों में किसी भी स्तर पर भावनात्मक या दबाव में लिया गया निर्णय न्याय की अवधारणा को कमजोर कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डीआईजी को अनुसंधान की कानूनी गुणवत्ता, पुलिस अधिकारियों की भूमिका और जवाबदेही, पीड़िता के अधिकार और सुरक्षा,
तथा आरोपी को मिले किसी भी अनुचित लाभ, इन सभी पहलुओं पर कानून के दायरे में रहकर निष्पक्ष निर्णय लेना होगा।

ज़मानत पर भी टिकी निगाहें

उधर, आरोपी कथावाचक की ज़मानत को लेकर भी पूरे ज़िले की निगाहें न्यायालय पर टिकी हैं। पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में ज़मानत कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है।ऐसे में गेंद प्रशासन और न्यायालय  दोनों के पाले में है ,हालांकि परिजनों का कहना हे कि न्यायालय से उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।