पॉक्सो में रसूख बनाम कानून! मेडिकल रिपोर्ट की आड़ में नाबालिग को बालिग बताने की कोशिश, डीजीपी–डीआईजी तक पहुँचा मामला ,सवाल यही कि कागजों के लिखावट में कहीं वरीय पुलिस पदाधिकारी ना कर दे कोई खेल ?डीजीपी की नजर के आगे कहाँ तक टिकते हे जिला के वरीय पुलिस पदाधिकारी ?

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय 

महिला थाना में दर्ज पॉक्सो एक्ट कांड संख्या 182/25 में कथावाचक श्रवण दास और चर्चित मौनी बाबा के विरुद्ध पुलिस द्वारा मामले को सत्य करार दिए जाने के बाद गिरफ्तारी लगभग तय मानी जा रही हे । इसी बीच बड़े रसूखदारों के फोन और कई कॉल ने जिला के वरीय पुलिस अधिकारियों की नींद हराम कर दी है ,ऐसी चर्चा हर गली चौंक -चौराहों पर हे ,चर्चा यह भी हे कि बच्ची नाबालिग नहीं बालिग हे और यह बात पुलिस के आलाधिकारियों के जुबान पर हे ?

अब वरीय पदाधिकारियों की ओर से यह बातें सामने आने लगी हे कि “लड़की की मेडिकल रिपोर्ट में उसकी उम्र 20–21 वर्ष बताई गई है, ऐसे में पॉक्सो कैसे बनेगा और मौनी बाबा कैसे दोषी होंगे ?”

जैसे ही यह बात पीड़ित पक्ष के कानों तक पहुँची, परिजन सीधे डीजीपी के जनता दरबार पहुँचे और पूरे प्रकरण की शिकायत दर्ज कराई।

डीजीपी ने लिया संज्ञान, DIG–SSP को किया फोन

डीजीपी ने तत्काल एसएसपी से फोन पर जानकारी ली,और निर्देश दिया कि कानून संगत इस मामले में कारवाई हो।वहीं क्षेत्रीय डीआईजी को भी कॉल कर मामले की समीक्षा और दोषियों पर कार्रवाई का निर्देश दिया।

डीआईजी ने आश्वासन दिया कि 17 जनवरी 2026 को मामले की विधिवत समीक्षा की जाएगी।

गुरुवार को पीड़ित पक्ष के परिजन डीआईजी से मिले और घटना से जुड़े सभी तथ्यों, दस्तावेज़ों और कानूनी बिंदुओं से उन्हें अवगत कराया।

लेकिन सवाल यहीं से खड़ा होता है…

पीड़ित पक्ष के अनुसार डीआईजी ने बातचीत में कहा कि“मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार लड़की तो बालिग है?”

अगर उम्र पर चर्चा की जा रही है, तो सवाल यह भी है कि
क्या वरीय अधिकारी पॉक्सो और किशोर न्याय कानून की स्पष्ट धाराओं से अनजान हैं?या इस कानून से अवगत नहीं हे ,और अवगत नहीं हे तो सरकार को चाहिये कि ऐसे ऐसे पदाधिकारियों को कानून के पन्नों से अवगत कराते हुये प्रशिक्षण दिया जाय और फिर जिला में बेहतर पुलिसिंग के लिये भेजा जाय ?

यहां बता दे कि इस मामले में स्कूल प्रमाण पत्र ही अंतिम प्रमाणपत्र हे ,यह बताना अनिवार्य हे और यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि

नाबालिग का स्कूल प्रमाण पत्र प्राथमिकी के साथ संलग्न है

जन्म तिथि : 25 जनवरी 2008
अर्थात पीड़िता 25 जनवरी 2026 के बाद ही बालिग होगी।

इतना ही नहीं, पीड़िता की माँ द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में साफ उल्लेख है कि 3 अप्रैल 2024 को दवा खिलाकर गर्भपात कराया गया,जिसका सीधा अर्थ है कि उससे पहले और लंबे समय से नाबालिग का जबरन शारीरिक शोषण होता रहा।उस समय पीड़िता की उम्र लगभग साढ़े पंद्रह या  16 वर्ष थी , यानी स्पष्ट रूप से नाबालिग,

कानून क्या कहता है?

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम की धारा 94 के अनुसार 

1. मैट्रिक/स्कूल प्रमाण पत्र से उम्र तय होगी
2. उसके अभाव में समकक्ष प्रमाण पत्र
3. फिर जन्म प्रमाण पत्र
4. मेडिकल रिपोर्ट अंतिम विकल्प है, प्राथमिक नहीं ?यानि जब कोई प्रमाण पत्र नहीं होंगे फिर आप मेडिकल रिपोर्ट का सहारा ले सकते हे लेकिन जब मामला काफी हाई प्रोफाईल हो और पैसों का दम हो  तो मेडिकल रिपोर्ट भी बदले जा सकते हे और पुलिस के अधिकारी भी बिक सकते हे ?

सुप्रीम कोर्ट ने भी जर्नाइल सिंह बनाम हरियाणा सरकार और 
प्राग भाटी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामलों में साफ कहा है कि उम्र निर्धारण में मेडिकल रिपोर्ट नहीं, स्कूल प्रमाण पत्र मान्य होगा।

इस पूरे प्रकरण में परिजन कहते हे कि मौनी बाबा के द्वारा नाबालिग को न्याय दिलाने के बदले सालों तक उनके द्वारा  बरगलाया गया ,उनके और उनके टीम के द्वारा नाबालिग और उसकी मां को डराया गया ,धमकाया गया यही नहीं महिला विकास मंच की संरक्षक द्वारा भी बरगलाया गया और कई महीने बिताए गये।

न्यायालय में दर्ज नाबालिग के बयान को भी बढ़िया से पुलिस को अवलोकन करना चाहिये ताकि इस मामले में नाबालिग की जिंदगी से खेलने वाले सभी पर कारवाई हो ?इन सभी को अब अप्राथमिकी अभियुक्त बनाकर इनकी गिरफ्तारी भी तय होना चाहिये?

यही नहीं इस मामले में महिला थाना पुलिस से हुई लापरवाही मामले की भी जांच कर दोषी पुलिस पदाधिकारी पर कारवाई होनी चाहिये क्यूंकि तीन दिसंबर 25को थाने में गई नाबालिग के बयान पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई यही नहीं 19दिसंबर25 को प्राथमिकी दर्ज हुई तो पुरुष अनुसंधानक बनाया गया और 30 घंटे बीतने के बाद दस बजे रात में दों पुरुष और एक महिला नाबालिग के घर घटना स्थल देखने गई ,पुलिस दिन में जा सकती थी ,रात में जाना पुलिस के मंशा को दर्शाता हे यही नहीं  नाबालिग को मेडिकल कराने में पांच दिन लग गये  ,मतलब साफ था नाबालिग को टॉर्चर करना ,कि पैसा बोलता हे ?

सबसे बड़ा सवाल

क्या रसूखदारों के फोन के आगे पॉक्सो कानून, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और पीड़िता के दस्तावेज़ दबा दिए जाएंगे?या फिर कथावाचक और मौनी बाबा पर कानून अपना काम करेगा?अब निगाहें 17 जनवरी की समीक्षा और उसके बाद की कार्रवाई पर टिकी हैं।