विशेष लेख: लोकतंत्र की शुचिता और ‘फर्जी वोटिंग’ का दंश – आखिर विरोध क्यों?
विशेष लेख: लोकतंत्र की शुचिता और ‘फर्जी वोटिंग’ का दंश – आखिर विरोध क्यों?
विशेष लेख: लोकतंत्र की शुचिता और ‘फर्जी वोटिंग’ का दंश – आखिर विरोध क्यों?
दस्तक7मिडिया, इं.आर.के.जायसवाल का विशेष रिपोर्ट।
भारतीय लोकतंत्र की नींव ‘एक व्यक्ति, एक मत’ के सिद्धांत पर टिकी है। लेकिन जब इस पवित्र प्रक्रिया में ‘फर्जी मतदाताओं’ की सेंधमारी होती है, तो यह केवल चुनावी हार-जीत का अंतर नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर प्रहार होता है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 326 स्पष्ट करता है कि मतदाता वही हो सकता है जो भारत का नागरिक हो और वयस्क हो। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जो विदेशी हैं या जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, वे हमारी नियति कैसे तय कर सकते हैं?
भारतीय चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) की प्रक्रिया देश की एकता और अखंडता के लिए एक अनिवार्य सुरक्षा कवच है। इसका मूल उद्देश्य मतदाता सूची से उन नामों को हटाना है जो मृत हैं, स्थानांतरित हो चुके हैं या अवैध रूप से शामिल किए गए हैं।
विडंबना देखिए कि जहां इस प्रक्रिया का स्वागत होना चाहिए था, वहीं कांग्रेस, टीएमसी, राजद और डीएमके जैसे दल इसका निरंतर विरोध कर रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी इस पर राजनीति हुई, जिसे अंततः माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने हरी झंडी दी। सवाल यह है कि पारदर्शी मतदाता सूची से किसी भी दल को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? क्या विरोध का आधार राष्ट्रहित है या केवल ‘वोट बैंक’ की असुरक्षा?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में ढाका विधानसभा क्षेत्र से सामने आए तथ्य चौंकाने वाले और लोकतांत्रिक मर्यादा को शर्मसार करने वाले हैं। भाजपा प्रत्याशी पवन जायसवाल द्वारा न्यायालय में पेश किए गए आंकड़े चुनावी प्रणाली की खामियों को उजागर करते हैं। उनके अनुसार-
298 मतदाता विदेश में थे।
45 मतदाता मृत थे।
1057 मतदाता राज्य से बाहर थे।
3 मतदाता जेल में बंद थे।
41 नाम दोहराए गए थे।
जब जीत का अंतर मात्र 178 मतों का हो (राजद प्रत्याशी फैजल रहमान की जीत), तब इतने बड़े पैमाने पर संदिग्ध मतदान पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यह मामला अब न्यायालय के विचाराधीन है, लेकिन यह सोचने पर मजबूर करता है कि SIR के तहत बिहार से 47 लाख नाम हटने के बाद भी क्या तंत्र में ‘लूपहोल्स’ बाकी हैं?
कानूनी पक्ष और कड़ा दंड अनिवार्य
फर्जी मतदान केवल एक त्रुटि नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(1) का खुला उल्लंघन है। यह धारा 135 के तहत एक दंडनीय अपराध है, जिसमें कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। यदि योजनाबद्ध तरीके से मृत या अनुपस्थित लोगों के नाम पर वोट डाले जा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक निगरानी की विफलता है।आज देश के मतदाताओं को यह सोचना होगा कि भारत की नीतियां भारतीयों के हित में बनेंगी या किसी ‘बाहरी प्रभाव’ या ‘विदेशी वोट बैंक’ के दबाव में? कुछ दलों की राजनीति अगर विदेशी मूल या अवैध प्रवासियों के इर्द-गिर्द सिमट रही है, तो यह देश की लोकतांत्रिक जड़ों को खोखला करने जैसा है।
लोकतंत्र की आत्मा जनता का विश्वास है। ढाका विधानसभा जैसी घटनाएं उस विश्वास को तोड़ती हैं। हमारी मांग है कि,
मतदाता सूची की गड़बड़ियों और फर्जी मतदान के आरोपों की उच्चस्तरीय एवं समयबद्ध जांच हो।
दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और संलिप्त व्यक्तियों पर ऐसी कार्रवाई हो जो भविष्य के लिए मिसाल बने। एस आई आर जैसी प्रक्रियाओं को और अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए ताकि ‘एक भी फर्जी वोट’ तंत्र में न बच सके।अंततः, भारत चलेगा भारतीयों के हित में। लोकतंत्र में विरोध रचनात्मक होना चाहिए, न कि देश की अखंडता को कमजोर करने वाला।