सुर्खियों में मौनी बाबा: आस्था के आवरण में आरोपों का जाल, पुलिस-प्रशासन कटघरे में
सुर्खियों में मौनी बाबा: आस्था के आवरण में आरोपों का जाल, पुलिस-प्रशासन कटघरे में
सुर्खियों में मौनी बाबा: आस्था के आवरण में आरोपों का जाल, पुलिस-प्रशासन कटघरे में
दस्तक 7मीडिया /दरभंगा
वर्षों से आस्था और विश्वास का प्रतीक माने जाने वाले चर्चित मौनी बाबा इन दिनों गहरे विवादों में घिरते नजर आ रहे हैं। कथावाचक से जुड़ी एक कथित चूक के बाद जैसे-जैसे परतें खुलीं, वैसे-वैसे मौनी बाबा से जुड़े पुराने ज़मीनी विवाद, आरोप और गतिविधियां सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती चली गईं। इस पूरे प्रकरण ने समाज के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खुद को ‘मौनी’ बताने वाले बाबा की जीवनशैली अब सवालों के घेरे में है। त्याग और ईश्वर-भक्ति की बात करने वाले बाबा निजी बॉडीगार्ड के साथ चलते रहे, प्रभावशाली रसूख़ रखते हैं और राजनीतिक गलियारों तक उनकी मजबूत पकड़ की चर्चाएं आम हैं। सवाल उठता है कि जो बाबा सांसारिक मोह-माया से दूर होने का दावा करते हैं, उन्हें हथियारबंद सुरक्षा की जरूरत क्यों पड़ी?
पेरवी, रसूख़ और कार्रवाई की सुस्ती
सूत्रों का दावा है कि कई प्रभावशाली नेता और मंत्री मौनी बाबा के कथित पेरवीकार हैं। यही कारण बताया जा रहा है कि मामले में कार्रवाई की रफ्तार बेहद सुस्त दिख रही है।
पॉक्सो मामला और महिला थाना की भूमिका पर सवाल
इसी बीच नाबालिग से दुष्कर्म (पॉक्सो) जैसे गंभीर मामले में महिला थाना की भूमिका भी कटघरे में है। महिला थानाध्यक्ष और अपर थानाध्यक्ष पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से सवाल और गहरे हो गए हैं। क्या पॉक्सो जैसे संगीन मामलों को भी लेन-देन और दबाव में ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है? जिले के कौन-से पुलिस पदाधिकारी जानबूझकर देरी कर रहे हैं?यह गंभीर विषय हे ?
गिरफ्तारी पर सहमति, फिर देरी क्यों?
सूचना है कि पुलिस पदाधिकारी के बड़े स्तर से कथावाचक और मौनी बाबा की गिरफ्तारी को लेकर सहमति बन चुकी है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में अब तक गिरफ्तारी नहीं होना कई सवाल खड़े करता है। अगर सब कुछ स्पष्ट है, तो कार्रवाई में देरी क्यों?
बॉडीगार्ड हटे, सवाल बरकरार
फिलहाल जिला पुलिस ने मौनी बाबा के बॉडीगार्ड हटा दिए हैं। जानकारों की मानें तो बॉडीगार्ड के रहते गिरफ्तारी और निशानदेही के आधार पर कथावाचक तक पहुंचना पुलिस के लिए अपेक्षाकृत आसान हो सकता था। ऐसे में अब तक की कार्रवाई और रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
इलाके में यह चर्चा तेज है कि रसूख़ की चादर एक सीमा तक ही बचा सकती है ,और जैसा कहा जाता है, पाप का घड़ा देर-सवेर फूटता ज़रूर है। अब देखना यह है कि दरभंगा पुलिस और प्रशासन कानून के तराजू पर आस्था, रसूख़ और सत्ता तीनों को बराबरी से तौल पाते हैं या नहीं।