पॉक्सो एक्ट में महिला पुलिस की अहम भूमिका: जांच में लापरवाही अब नहीं चलेगी,पीड़ित बच्ची की सुरक्षा, गोपनीयता और सम्मान की जिम्मेदारी महिला पुलिस पर, नियम तोड़ने पर कार्रवाई तय लेकिन कारवाई अब तक नदारद।
पॉक्सो एक्ट में महिला पुलिस की अहम भूमिका: जांच में लापरवाही अब नहीं चलेगी,पीड़ित बच्ची की सुरक्षा, गोपनीयता और सम्मान की जिम्मेदारी महिला पुलिस पर, नियम तोड़ने पर कार्रवाई तय लेकिन कारवाई अब तक नदारद।
पॉक्सो एक्ट में महिला पुलिस की अहम भूमिका: जांच में लापरवाही अब नहीं चलेगी,पीड़ित बच्ची की सुरक्षा, गोपनीयता और सम्मान की जिम्मेदारी महिला पुलिस पर, नियम तोड़ने पर कार्रवाई तय लेकिन कारवाई अब तक नदारद।
दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा /संजय कुमार राय
दरभंगा जिला के महिला थाना पुलिस पर नाबालिग से दुष्कर्म मामले में की जा रही लापरवाही पर जिला के महिला संगठनों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया हें ,और वरीय पुलिस पदाधिकारी से जांच की मांग कर दी हें।महिला संगठनों का कहना हें कि धर्म और आस्था में लीन व्यक्ति यदि समाज में ऐसा करने लगेंगे तो लोंगों का विश्वास आखिर किसपर होगा।महिला संगठनो ने पुलिस को चेतावनी भी दी हें कि समय रहते आरोपी नहीं पकड़ा जाता हें तो महिला संगठन द्वारा आंदोलन भी किया जा सकता हें।महिला संगठन की एक समाजसेबी कहती हें कि फिर से आरोपी पक्ष द्वारा प्रलोभन देकर नाबालिग पर दबाव बनाया जा सकता हें।
पॉक्सो एक्ट में नियम क्या कहता हें ?
इस एक्ट के तहत सरकार भी गंभीर हें ,सुप्रीम कोर्ट के भी कई दिशा निर्देश हें ,लेकिन इसका पालन इस मामले में नहीं हुआ।नाबालिगों से जुड़े यौन अपराधों में पॉक्सो एक्ट के तहत महिला पुलिस अधिकारी की भूमिका को बेहद अहम और जिम्मेदारीपूर्ण बनाया गया है। कानून में स्पष्ट निर्देश है कि पीड़ित बच्ची का बयान अनिवार्य रूप से महिला पुलिस अधिकारी द्वारा ही दर्ज किया जाएगा। यदि इस प्रक्रिया में लापरवाही या नियमों का उल्लंघन होता है, तो संबंधित पुलिसकर्मी पर विभागीय और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
जबकि महिला थाना पुलिस की एक महिला पदाधिकारी और दों पुरुष कर्मी पीड़ित बच्ची के घर 20दिसंबर की दस बजे रात गई थी ,जबकि प्राथमिकी 19दिसंबर 25को ही दर्शाया गया हें।दस बजे रात में नाबालिग के घर पुरुष /महिला पुलिस का जाना भी अपराध के श्रेणी में आता हें ,पीड़ित नाबालिग कोई अपराधी नहीं थी ,आरोपी पक्ष द्वारा नाबालिग को बरगलाया गया जिस कारण कई महीने लगे तब जाकर प्राथमिकी दर्ज हुई हें।जिसका उदाहरण हें कि आसाराम बापू जैसे चर्चित कथित महात्मा पर घटना के दों साल बाद प्राथमिकी हुई और कानून ने उन्हें सजा दी।
पॉक्सो एक्ट के अनुसार, पीड़ित का बयान थाने में नहीं बल्कि उसके घर या किसी सुरक्षित और भरोसेमंद स्थान पर लिया जाना चाहिए, ताकि बच्ची मानसिक दबाव और डर से मुक्त रह सके। बयान के दौरान बच्ची के माता-पिता, अभिभावक या किसी विश्वसनीय व्यक्ति की उपस्थिति भी सुनिश्चित करनी होती है।लेकिन महिला थाना की पुलिस ने इस नियम का पालन तो की मगर दस बजे रात में वह भी दों पुरुष पुलिस कर्मी के साथ ,इससे पीड़ित बच्ची का और भी संतुलन बिगड़ने जैसी बात थी।
महिला पुलिस को यह भी निर्देश दिया गया है कि पूछताछ के दौरान कठोर भाषा, धमकी या डराने का रवैया पूरी तरह वर्जित है। बच्चे से बार-बार बयान लेना या उसे अपराध की घटनाओं को दोहराने के लिए मजबूर करना कानूनन गलत माना जाता है।लेकिन इस मामले में पीड़ित नाबालिग का दों से तीन बार बयान लिया गया।
पॉक्सो एक्ट के तहत पीड़ित की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है। महिला पुलिस की जिम्मेदारी है कि बच्ची का नाम, पता, फोटो या कोई भी पहचान से जुड़ी जानकारी मीडिया या सार्वजनिक मंच पर लीक न हो। गोपनीयता भंग होने की स्थिति में संबंधित अधिकारी पर भी कानूनी शिकंजा कस सकता है।पर 3दिसंबर 25को जब नाबालिग थाने पर आवेदन दी थी तो उस आवेदन पर प्राथमिकी महिला पुलिस ने नहीं की और थाना केम्पस में ही किसी मीडिया कर्मी ने उसका फोटो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया ,इसके बाद भी महिला थाना की पुलिस नींद से नहीं जागी ,ऐसी परिस्थिति में महिला थाना पुलिस को चाहिये था कि या तो स्वयं या फिर उसी आवेदन पर प्राथमिकी दर्ज कर देना चाहिये था जो नहीं हुआ?
इसके साथ ही महिला पुलिस को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि पीड़ित को चिकित्सकीय जांच, काउंसलिंग और कानूनी सहायता तुरंत उपलब्ध कराई जाए। FIR दर्ज करने में देरी या टालमटोल को गंभीर लापरवाही माना जाता है,और यह लापरवाही भी महिला पुलिस ने की हें।जब 19दिसंबर 25को प्राथमिकी हो गई तो चिकित्सीय जांच ,काउंसिलिंग में पूरे 5दिन लगे ,इसके बाद 183 BNNS के तहत न्यायालय में नाबालिग का बयान दर्ज हुआ।
कानून विशेषज्ञों के अनुसार, POCSO एक्ट में महिला पुलिस को केवल जांच अधिकारी नहीं, बल्कि पीड़ित की संरक्षक और भरोसेमंद सहारा की भूमिका सौंपी गई है। नियमों का पालन न होने पर मामला कमजोर हो सकता है और दोषी बच सकते हैं, इसलिए महिला पुलिस की जवाबदेही और सख्ती दोनों तय की गई हैं।अब सवाल यही हें कि महिला थानाध्यक्ष द्वारा पॉक्सो के तहत इतनी लापरवाही क्यूँ बरती गई।यह जांच का विषय हें ?