रसूख के आगे बेबस सिस्टम? दुष्कर्म पीड़ित नाबालिग को महिला थाना कांड 182/25 में न्याय मिलने में देरी क्यों  ?

आरोपी कथावाचक के साथ-साथ चर्चित मौनी बाबा और महिला विकास मंच के संरक्षक की भूमिका पर गंभीर सवाल, पीड़िता को सालभर तक न्याय से दूर रखने का आरोप 

दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा /संजय कुमार राय 

दरभंगा में दर्ज महिला थाना कांड संख्या 182/25 ने कानून, पुलिस और तथाकथित समाजसेवियों की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सवाल सीधा है -क्या रसूखदारों के दबाव में दुष्कर्म से पीड़ित नाबालिग को न्याय मिल पाएगा ?पीड़ित परिजनों का आरोप हें कि मौनी बाबा ,महिला विकास मंच की संरक्षक आदि ने काफी दिनों तक भटकाया और न्याय से दुर कर दिया।

इस मामले में दुष्कर्म के आरोपी के रूप में कथावाचक श्रवण दास का नाम सामने है, लेकिन प्राथमिकी में दरभंगा जिले के चर्चित मौनी बाबा पर भी मामले को दबाने और लीपापोती करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। एफआईआर के अनुसार, परिजनों के आक्रोशित होने पर मौनी बाबा ने अपने कैंपस के एक कमरे में कथावाचक और नाबालिग लड़की को माला पहनाकर तथाकथित शादी करा दी। आरोप है कि इस पूरे घटनाक्रम के जरिए नाबालिग के साथ हुए दुष्कर्म पर पर्दा डालने की कोशिश की गई, पुलिस को सूचना नहीं दी गई और पीड़िता को अंधेरे में रखा गया। नतीजा यह हुआ कि नाबालिग को न्याय के लिए करीब एक साल तक इंतजार करना पड़ा।जब ऐसे बड़े बड़े चालबाजो की सारी दिमागी हरकत थम गयी तब प्राथमिकी दर्ज हुई हें ?

मामले को दबाने के प्रयास यहीं नहीं रुका , आरोप है कि कुछ पत्रकारों के साथ-साथ महिला विकास मंच, पटना की संरक्षक वीणा मानवी ने भी सोशल मीडिया पर नाबालिग और उसके परिजनों पर ही दोष मढ़ दिया। सोशल मीडिया पर दिए गए उनके वक्तव्य से लोग स्तब्ध रह गए। उन्होंने दावा किया कि काउंसिलिंग के दौरान दोनों पक्ष कई बार उनके पास आए, सुलह नहीं हो सकी और नाबालिग के परिजनों ने पहले 25 लाख रुपये तथा बाद में एक करोड़ रुपये नगद और एक कट्ठा जमीन की मांग की और मामला वहीं थम गया ?

हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि यदि मामला नाबालिग से जुड़े दुष्कर्म का था, तो सुलह-समझौते की प्रक्रिया ही कैसे अपनाई गई? कानून के मुताबिक नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों में समझौते का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में आरोप है कि मौनी बाबा की तरह ही वीणा मानवी ने भी वही गलती की।नाबालिग के हित में कानूनी कार्रवाई की जगह मामले को दबाने की भूमिका निभाई।

आलोचकों का कहना है कि यदि पुलिस निष्पक्ष अनुसंधान करे, तो नाबालिग के साथ हुए इस कथित व्यवहार और मामले को छिपाने के प्रयासों को लेकर अन्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी अभियुक्तों के दायरे में आनी चाहिए। सवाल यह भी उठ रहा है कि महिला विकास मंच जैसी संस्था वास्तव में पीड़ित महिलाओं और लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए काम कर रही है या उनके शोषण का जरिया बनती जा रही है।

यदि लड़की दुष्कर्म की शिकार थी और सुलह नहीं हो पाई थी, तो संस्था की जिम्मेदारी थी कि वह नाबालिग की ओर से महिला थाना में आवेदन देकर प्राथमिकी दर्ज कराती, न कि सोशल मीडिया पर पीड़िता और उसके परिजनों को अपमानित करती। कोई भी सामाजिक संस्था अदालत या सरकारी तंत्र नहीं है कि कुर्सी पर बैठकर फैसला सुना दे  ?

इधर, महिला थाना पुलिस की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि पुलिस भी वही कर रही है, जो अन्य प्रभावशाली लोग अब तक उस नाबालिग और उसके परिजन के साथ  करते रहे हें ,पीड़िता को सहयोग देने के बजाय उसे परेशान किया जा रहा है।कानूनन प्राथमिकी के दिन ही नाबालिग का मेडिकल और न्यायालय में 164 दप्रस 0/183 बीएनएसएस का बयान हो जाना चाहिये जो चार दिन बीत जाने के बाद यानि खबर लिखने तक नहीं हुआ हें ,इसे क्या माना जाय ?महिला थाना पुलिस की लापरवाही या फिर जानबूझकर गलती ?या फिर ज्ञान का अभाव ?क्यूंकि नाबालिग के साथ हुये दुष्कर्म /कथित दुष्कर्म के मामले में इतनी लापरवाही बरतकर काम करना मतलब अभियुक्तो को लाभ पहुंचाना हें ,पुलिस के वरीय पदाधिकारी अच्छे से समझ सकते हें।

अब सबसे अहम प्रश्न यही है कि क्या रसूखदारों के इस पूरे जाल को तोड़कर नाबालिग पीड़िता को वास्तव में न्याय मिल पाएगा?