पराली प्रबंधन को लेकर किसान एवं कृषि यंत्र विक्रेताओं के साथ जिलाधिकारी ने की समीक्षा बैठक
पराली प्रबंधन को लेकर किसान एवं कृषि यंत्र विक्रेताओं के साथ जिलाधिकारी ने की समीक्षा बैठक
पराली प्रबंधन को लेकर किसान एवं कृषि यंत्र विक्रेताओं के साथ जिलाधिकारी ने की समीक्षा बैठक
दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा /
जिला पदाधिकारी कौशल कुमार की अध्यक्षता में पराली जलाने की समस्या एवं उसके स्थायी समाधान को लेकर जिला कृषि पदाधिकारी, उप-निदेशक कृषि अभियंत्रण, प्रगतिशील कृषक/किसान तथा कृषि यंत्र विक्रेताओं के साथ समीक्षात्मक बैठक आयोजित की गई।
बैठक के दौरान जिलाधिकारी द्वारा पराली जलाने से होने वाले दुष्प्रभावों पर किसानों के साथ विस्तृत चर्चा की गई तथा पराली प्रबंधन के विभिन्न वैकल्पिक उपायों पर विचार-विमर्श किया गया। किसानों ने बताया कि कंबाइन हार्वेस्टर के उपयोग के बाद धान की पराली एवं ठूंठ खेतों में रह जाने से गेहूं की बुआई में विलंब होता है, जिसके कारण मजबूरी में पराली जलाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। इससे पर्यावरण, मिट्टी और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
जिला कृषि पदाधिकारी एवं उप-निदेशक कृषि अभियंत्रण द्वारा किसानों को जानकारी दी गई कि पराली प्रबंधन के लिए रोटरी मल्चर, सुपर सीडर, बेलर, हैप्पी सीडर जैसे आधुनिक कृषि यंत्रों का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा रोटरी मल्चर एवं सुपर सीडर की खरीद पर 80 प्रतिशत तक अनुदान की सुविधा उपलब्ध है।
इसके अतिरिक्त कंबाइन हार्वेस्टर के स्थान पर रीपर-कम-बाइंडर के उपयोग से फसल अवशेष प्रबंधन को बेहतर बनाया जा सकता है।
जिलाधिकारी ने किसानों से अपील की कि खेतों में फसल अवशेष जलाने के बजाय बेलर मशीन से खेत की सफाई, वर्मी कम्पोस्ट निर्माण तथा मल्चिंग विधि को अपनाकर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखें और संधारणीय कृषि पद्धति को बढ़ावा दें।
उन्होंने कहा कि फसल अवशेष जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी में उपलब्ध सूक्ष्म जीवाणु, केंचुए आदि नष्ट हो जाते हैं और फसल उत्पादन क्षमता में कमी आती है। साथ ही जैविक कार्बन, जो पहले से ही कम है, वह भी नष्ट हो जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है।
जिलाधिकारी ने किसानों से आग्रह किया कि पुआल नहीं जलाकर स्ट्रा बेलर, हैप्पी सीडर, जीरो टिल सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल, रीपर-कम-बाइंडर, स्ट्रा रीपर एवं रोटरी मल्चर जैसे कृषि यंत्रों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दें।