दरभंगा में शांतिपूर्ण रहा मतदान, मतदाताओं की चुप्पी में छिपा लोकतंत्र का गूढ़ संदेश,कई प्रत्याशियों के सुख रहें हे ओंठ ,14नवंबर को ही खुलेगा राज कि कौन जीता और कौन हारा।

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय

लोकतंत्र के इस महापर्व में गुरुवार का दिन दरभंगा के लिए अनुशासन और संयम का उदाहरण बन गया। मौसम सुहावना था, हवा में हल्की ठंडक और उत्सव का एहसास था, पर मतदाताओं के चेहरों पर एक अजीब सी गंभीरता दिखाई दी। कहीं कोई हंगामा नहीं, न कोई विवाद।बस शांति, सन्नाटा और मतपेटियों की ओर बढ़ते मौन कदम। यह मौन ही इस बार के मतदान की सबसे बड़ी कहानी बन गया।

सुबह के समय बूथों पर भीड़ अपेक्षाकृत कम रही। मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हल्की सक्रियता दिखी, पर वह भी वर्षों से चली आ रही उत्साही भीड़ के मुकाबले मद्धम थी। लोग एक-एक कर बूथ तक पहुंचे, अपनी उंगली पर लोकतंत्र की स्याही लगाई और बिना कुछ कहे लौट गए। इस “चुपचाप मतदान” ने प्रत्याशियों के दिल की धड़कनें तेज कर दीं। कौन किसके पक्ष में खामोशी से मत डाल गया, यह किसी को नहीं पता।

दोपहर चढ़ते-चढ़ते हलचल जरूर बढ़ी। शहर के केंद्रों से लेकर गांवों तक लोग घरों से निकलने लगे। महिलाएं सज-संवरकर लोकतंत्र के इस पर्व में शामिल हुईं, वहीं युवा मतदाताओं ने पहली बार मतदान का अनुभव “एक जिम्मेदारी और गर्व का क्षण” बताते हुए साझा किया। हालांकि भीड़ कभी नियंत्रण से बाहर नहीं हुई।प्रशासनिक सतर्कता और मतदाताओं की सजगता दोनों ने मिलकर पूरे जिले में मतदान को शांतिपूर्ण बनाए रखा।

शाम होते-होते मतदान केंद्रों से लौटते लोगों के चेहरों पर एक अनकही तसल्ली थी, मानो उन्होंने अपना कर्तव्य निभा लिया हो। जैसे ही घड़ी ने छह बजाए, सभी ईवीएम सील की गईं और प्रत्याशियों की किस्मत मशीनों के भीतर बंद हो गई। बाहर अब सिर्फ अनुमान, चर्चा और बेचैनी का दौर चल रहा है।

महागठबंधन और एनडीए दोनों ही खेमों में आत्मविश्वास और संशय की मिश्रित लहर है। समर्थक गली-मोहल्लों में बैठकर संभावनाओं का गणित बिठा रहे हैं, जबकि उम्मीदवार अपने-अपने क्षेत्रों की प्रतिक्रिया को मन ही मन तौल रहे हैं।

मतदाताओं की यह चुप्पी अब सबसे बड़ा रहस्य बन चुकी है। शायद यह खामोशी आने वाले परिणामों में एक नया संदेश लिखे कि लोकतंत्र की असली ताकत नारे या नाराजगी में नहीं, बल्कि उस एक वोट में है, जो मौन रहकर भी सब कुछ कह देता है।