हत्या मामले में मब्बी थानाध्यक्ष से कोर्ट ने मांगा जवाब।अदालत ने कहा कि अनुसंधान में बरती गई हें घोर लापरवाही।

दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा/विधि संवाददाता,

दरभंगा सिविल कोर्ट के अपर सत्र न्यायाधीश सुमन कुमार दिवाकर की कोर्ट ने मब्बी थाना अध्यक्ष से एक हत्या मामले में अनुसंधान में की गई लापरवाही को लेकर जवाब तलव किया है। हत्या जैसे संगीन अपराध की प्राथमिकी दर्ज करने और केश के अनुसंधान में मब्बी थानाध्यक्ष की घोर लापरवाही सामने आई है।मब्बी थानाक्षेत्र के गेहूंमी गांव में गत 8 जून 25 को 55 वर्षीय गणेश्वर सिंह का संदिग्ध हालत में मब्बी थाना की पुलिस ने शव बरामद किया था।संदेहास्पद स्थिति में मृत ब्यक्ति को डीएमसीएच लाया गया।पोस्टमार्टम कराने के बाद मृतक का भेसरा संरक्षित किया गया जिससे कि मृत्यू के कारणों का पता चल सके। लोक अभियोजक अमरेन्द्र नारायण झा ने बताया कि इस सन्दर्भ में मृतक गणेश्वर सिंह का भाई हिमेश्वर सिंह के आवेदन पर शव बरामदगी के 44 दिन बाद थानाध्यक्ष सुशील कुमार ने मौलागंज के चंदन कुमार, बंगलागढ के विजय पुर्वे और नीलम देवी,खेराज साहपुर के कामाख्या नारायण सिंह, गेहूंमी के अशोक कुमार नायक,रतनपुर के मालती कुमारी के विरुद्ध इस हत्या मामले की प्राथमिकी 24 जूलको दर्ज किया।इस हत्या मामले के प्राथमिकी अभियुक्त कामाख्या नारायण सिंह, विजय पुर्वे और नीलम देवी की ओर से एक जमानत याचिका और चन्दन कुमार और अशोक नायक की ओर से एक दुसरा जमानत याचिका न्यायालय में दाखिल किया गया।दोनो याचिकाओं पर तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश सुमन कुमार दिवाकर की अदालत में हुई।कोर्ट ने बिना प्राथमिकी दर्ज किये शव का पोस्टमार्टम कराने, तथा भेसरा जांच हेतू भेजे जाने पर आश्चर्य ब्यक्त किया।न्यायालय ने मब्बी थाना में 8 जुन 25 पदस्थापित मब्बी थानाध्यक्ष का नाम बताने,8 जून 25 को घटना की प्राथमिकी क्यों नही दर्ज की गई का कारण बताने और हत्या मामले में 8 जून से 23 जूलाई तक चुप रहने को इस केश के भविष्य के साथ खिलवाड़ माना है।श्री दिवाकर की अदालत ने मब्बी थानाध्यक्ष के 17 नवंबर 25 को सदेह उपस्थित होकर न्यायालय द्वारा चिन्हित अनुसंधान में विलंब के बिन्दुओं पर जबाब देने का आदेश पारित किया है।वहीं थानाध्यक्ष और अनुसंधानक को एफ एस एल का रिपोर्ट और अद्दतन कांड दैनिकी के साथ सूनवाई के दौरान उपस्थित होने का आदेश दिया है,तथा इस केश के सुचक को भी न्यायालय का सहयोग करने हेतु सुचित करने का निर्देश दिया है।बताते चलें कि अनुसंधान में हुई लापरवाही का लाभ हमेशा से कथित आरोपी को ही मिलता रहा है।