दरभंगा में अपराध बेलगाम: पुलिस की नाकामी और टेक्निकल सेल पर टिका भरोसा,कहाँ तक उचित ?ना रोक -टोक ,ना दिवा या रात्रि गश्त ,क्या अपराधियों को पकड़ेगी डायल 112 की पुलिस या फिर थानेदार।
दरभंगा में अपराध बेलगाम: पुलिस की नाकामी और टेक्निकल सेल पर टिका भरोसा,कहाँ तक उचित ?ना रोक -टोक ,ना दिवा या रात्रि गश्त ,क्या अपराधियों को पकड़ेगी डायल 112 की पुलिस या फिर थानेदार।
दरभंगा में अपराध बेलगाम: पुलिस की नाकामी और टेक्निकल सेल पर टिका भरोसा,कहाँ तक उचित ?ना रोक -टोक ,ना दिवा या रात्रि गश्ती ,क्या अपराधियों को पकड़ेगी डायल 112 की पुलिस या फिर थानेदार ?
दस्तक 7मीडिया ,दरभंगा /संजय कुमार राय
दरभंगा जिला में आपराधिक घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। पुलिस अपराधियों पर नियंत्रण पाने में पूरी तरह विफल नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि अपराधी खुलेआम वारदात को अंजाम दे रहे हैं और पुलिस केवल टेक्निकल सेल के सहारे उद्भेदन का दावा करती दिखाई पड़ती है।हाल में ही कई थाना क्षेत्रों में लगातार चोरी ,लूट,हत्या जैसी घटनाओं ने आम लोंगों के जीवन में डर पैदा कर दिया हें ,मब्बी थाना क्षेत्र अंतर्गत कटरहिया में कृष्णा इंडेन गेस एजेंसी के गोदाम में आधा दर्जन हथियार बंद अपराधियों ने करीब 4लाख से उपर नगदी उड़ाकर फरार हो गये ,बहादुरपुर थाना क्षेत्र में स्वर्ण व्यवसायी की हत्या हो गई ,अन्य थाना क्षेत्रों में चोरी की घटनाएं विगत दिनों हुई हें।कई ऐसे मामले हें जिसका उद्भेदन करने में पुलिस के हाथ पांव फूल रहें हें ,ऐसे में सवाल उठता हें कि घटना घटने का क्या पुलिस इंतजार करती हें और टेक्निकल सेल के सहारे हाथ पर हाथ देकर बैठ गई हें ,भगवान के भरोसे इन घटनाओं को छोड़ दिया हें ?फिर थाना में थानेदार के पोस्टिंग का क्या मतलब ?कोई भी थानेदार अपने क्षेत्र में ना तों दिवा गश्ती कर रही हें ,ना ही रात्रि गश्ती और रोक -टोक करना तों पुलिस भूल चुकी हें ऐसे में बेहतर पुलिसिंग की कल्पना कैसे की जा सकती हें।डायल 112के भरोसे पुलिस काम कर रही हें।वजह साफ हें कि थानाध्यक्षों का अपने क्षेत्र में नेटवर्क नहीं हें और अपराधियों पर काम नहीं कर रही हें।
इससे तों बेहतर पुलिसिंग दशकों पहले बिना टेक्निकल के थानास्तर पर मजबूत नेटवर्क के सहारे पुलिस करती थी और घटना होने से पूर्व अपराधियों की धरपकड़ करती थी, लेकिन अब उस पारंपरिक नेटवर्क का असर लगभग खत्म हो चुका है। कई थानाध्यक्ष नौकरी जरूर कर रहे हैं, मगर अपराध नियंत्रण से उनका कोई लेना-देना नहीं है। उनकी दिलचस्पी अधिकतर शराब माफिया, भू-माफिया और अन्य उगाही वाले मामलों में ही दिखाई देती है।
कहा जा रहा है कि जब ऐसे थानेदारों की जेबें गर्म होती रहती हैं तो उनके चेहरे की चमक किसी फिल्मी हीरो जैसी नजर आती है। काला चश्मा पहनकर वे खुद को अमिताभ बच्चन से कम नहीं समझते, लेकिन वे भूल जाते हैं कि उन्होंने खाकी वर्दी अपराधियों के पीछे भागने के लिए पहनी है, न कि उनसे समझौता करने के लिए।
जिला में अपराध की बड़ी घटनाएं – चाहे लूट हो, हत्या हो या चोरी – घटित होते ही स्थानीय पुलिस टेक्निकल सेल पर निर्भर हो जाती है।
स्थिति यह भी है कि जिले में कई थानेदार ऐसे तैनात हैं जिनका पुराना रिकॉर्ड विवादों से भरा रहा है – कोई प्रेम प्रसंग में लिप्त हें तो कोई शराब माफिया से सांठगांठ के लिए बदनाम। अब ऐसे अधिकारियों से अपराध नियंत्रण की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
कुल मिलाकर, दरभंगा की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं और जनता असुरक्षा की स्थिति में जीने को मजबूर है।