गोद में एक जलता हुआ सपना और बह रहें आंसुओं के बींच कमला नदी ,सन्नाटे के बींच भी चीत्कार ,जिसकी होती थी पूजा उसी ने छीन लिया गोद।

दस्तक7मिडिया, अमीत झा, गौड़ा बौराम।

बिरौल अनुमंडल अंतर्गत गौड़ा बौराम प्रखंड के कसरौर बसौली गांव में पसरा सन्नाटा हर गुजरते पल के साथ गहराता जा रहा है। जिस कमला नदी का बहना यहां के लोगों के लिए जीवन की धुन थी, आज वह दर्द का एक खामोश समंदर बन गई है। बीते शनिवार की घटना ने इस गांव के कलेजे को छलनी कर दिया, जब एक साथ चार मासूम जिंदगियां काल के गाल में समा गईं।
इस दर्द की कहानी में सबसे दिल दहला देने वाला अध्याय शीतल कुमारी का है। एक ऐसी बच्ची, जिसकी जिंदगी बचपन से ही दुखों के साए में गुजरी। जन्म के ठीक एक हफ्ते बाद ही उसके पिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी, एक नाजुक सी कली, जिसे खिलने से पहले ही मुरझाना था।
शीतल की नन्हीं दुनिया उसके नाना-नानी के प्यार और त्याग के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थी। वे उसके लिए पिता का साया और मां का आंचल दोनों थे। उन्होंने अपनी कमजोर होती आंखों में शीतल के भविष्य के लिए न जाने कितने सपने बुने थे। वे जानते थे कि उनकी शीतल सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उस पिता की भी आखिरी निशानी है, जिसे वह कभी देख भी न पाई थी। शायद यही वजह थी कि हर सुबह जब सूरज की किरणें आंगन में उतरती थीं, तो वे उसके खिलखिलाने की आवाज में उस अधूरेपन को भूल जाते थे।
मगर अब सब कुछ खत्म हो चुका है। शनिवार की दोपहर जब गांव में कोहराम मचा, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके हाथों की लाठी छिन गई और आंखों का नूर बुझ गया।
जिस मासूम की किलकारियां कभी इस घर में गूंजा करती थीं, आज उसकी अंतिम यात्रा की तैयारी हो रही थी। लेकिन विडंबना देखिए, जिस पिता को अपनी बेटी को आखिरी विदाई देनी चाहिए थी, वह बहुत पहले जा चुका था। शीतल को मुखाग्नि देने वाला भी कोई नहीं था। ऐसे में उसका चाचा संतोष साहू आगे आए। एक ही मोहल्ले से चार मासूमों की अर्थी उठने का दृश्य इतना हृदय विदारक था कि हर आंख से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। पंचायत के मुखिया रंजीत झा (गुड्डू झा) ने भी पीड़ित परिवारों को ढाढस बंधाया और सरकार से मदद की गुहार लगाई, लेकिन इस दर्द को कोई भी आर्थिक मदद कम नहीं कर सकती।
यह सिर्फ चार बच्चों की मौत नहीं, बल्कि उन चार परिवारों का वो सपना है जो एक साथ जलकर राख हो गया है। एक ऐसा दर्द, जिसकी तपिश न सिर्फ कसरौर बसौली, बल्कि पूरे गौड़ा बौराम प्रखंड को झुलसा रही है।­