टेंडर फाइनल होने और फंड स्वीकृति के बाद भी रामजान नदी के जीर्णोद्धार में सबसे बड़ी बाधा अतिक्रमण बना हुआ है। हालांकि विभाग का बहाना है कि कटाव निरोधी कार्य के चलते जीर्णोद्धार में देरी हो रही है। जबकि नदी के बड़े भूभाग पर आलीशान मकान, दुकानें और गोदाम बना लिए गए हैं।
आलम यह है कि कई जगह यह नदी अतिक्रमण से नाले का शक्ल ले चुकी है। हालंाकि, जिला प्रशासन ने 343 अतिक्रमणकारियों की पहचान की है। खास बात यह है कि सबसे ज्यादा शहरी क्षेत्र में अतिक्रमण है। रही सही कसर वोट के लालच में जनप्रतिनिधियों ने नदी की जमीन पर पक्की सड़कें बनवाकर पूरी कर दी है। ऐसे में बिना अतिक्रमण हटाए जीर्णोद्धार कार्य खानापूर्ति बनकर रह जाने की ज्यादा संभावना है।
बतातें चलें कि जनवरी में सीएम नीतीश कुमार प्रगति यात्रा के क्रम में किशनगंज पहुंचे थे तो नगर परिषद प्रशासन ने रमजान नदी के जीर्णोद्धार की मांग की तो उन्होंने स्वीकार कर इसकी घोषणा कर दी। जल निस्सरण विभाग को इसकी जिम्मेदारी दी गई। विभाग ने राशि मिलने के बाद टेंडर फाइनल कर दिया। लेकिन अब 5 माह बाद भी काम शुरू नहीं हो पाया है।
इस कार्य में इकरारनामा भी रोड़ा है। जबकि 8.50 करोड़ की लागत से 9.45 किलोमीटर लंबी नदी का कायाकल्प होना हैं। नदी से गाद निकालकर किनारों पर वॉकिंग ट्रैक, शेड, पेयजल और रोशनी की व्यवस्था की जानी है। फलदार पौधे भी लगाए जाएंगे। इससे पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा।
बारिश शुरू होते लबालब हो जाएगी रमजान नदी जिले में प्री मानसून का आगमन हो चुका है। बरसात शुरू होते ही रमजान नदी जलमग्न हो जाएगी। ऐसे में गाद निकालने और जीर्णोद्धार कार्य की संभावना सीमित हो जाएगी।
यदि समय रहते कार्य शुरू नहीं किया गया तो इस योजना में लंबा समय लगना तय है। अधिकारियों की मानें तो जीर्णोद्धार के लिए डीपीआर पहले ही लघु सिंचाई विभाग द्वारा तैयार कर भेजा गया था। लेकिन अब इसे जल निस्सरण विभाग को सौंपा गया है। विभागीय फेरबदल और प्रक्रिया की जटिलता ने काम में और समय लग रहा है।
नदी पर अतिक्रमण भी है बड़ी चुनौती जीर्णोद्धार कार्य में सबसे बड़ी चुनौती अतिक्रमण है। रमजान नदी के बड़े हिस्से की जमीन पर अतिक्रमण है। कहीं-कहीं अतिक्रमण के चलते नदी ने नाले का शक्ल अख्तियार कर लिया है।
जिला प्रशासन ने 343 अतिक्रमणकारियों की पहचान की है। जिनमें आलीशान मकान, दुकानें और गोदाम बने हुए हैं। शहरी क्षेत्र में ही नदी की अधिकतर जमीन अतिक्रमित है। वार्ड पार्षदों द्वारा वोट बैंक के दबाव में कई स्थानों पर पक्की सड़कें भी नदी की जमीन पर बनवा दी गई हैं। ऐसे में बिना अतिक्रमण हटाए सम्पूर्ण जीर्णोद्धार केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगा।
