बहेड़ा थाना में दर्ज कांड (138/23 )किसी खौफनाक कहानी से कम नहीं,इस कांड के रचेता आखिर थे कौन ?तात्कालीन एसएसपी या फिर डीएसपी ?अधिवक्ता ने उठाया सवाल -मैं कोई अपराधी , ,आतंकवादी ,भू माफिया नहीं फिर एक ही दिन में प्राथमिकी समेत कैसे हो गई गिरफ्तारी।52 दिन जेल यात्रा का आखिर जिम्मेदार कौन ? अब डीआईजी से न्याय मिलने की उम्मीद।
बहेड़ा थाना में दर्ज कांड (138/23 )किसी खौफनाक कहानी से कम नहीं,इस कांड के रचेता आखिर थे कौन ?तात्कालीन एसएसपी या फिर डीएसपी ?अधिवक्ता ने उठाया सवाल -मैं कोई अपराधी , ,आतंकवादी ,भू माफिया नहीं फिर एक ही दिन में प्राथमिकी समेत कैसे हो गई गिरफ्तारी।52 दिन जेल यात्रा का आखिर जिम्मेदार कौन ? अब डीआईजी से न्याय मिलने की उम्मीद।
बहेड़ा थाना में दर्ज कांड (138/23 )किसी खौफनाक कहानी से कम नहीं,इस कांड के रचेता आखिर थे कौन ?तात्कालीन एसएसपी या फिर डीएसपी ?अधिवक्ता ने उठाया सवाल -मैं कोई अपराधी , ,आतंकवादी ,भू माफिया नहीं फिर एक ही दिन में प्राथमिकी समेत कैसे हो गई गिरफ्तारी।52 दिन जेल यात्रा का आखिर जिम्मेदार कौन ? अब डीआईजी से न्याय मिलने की उम्मीद।
दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय
बहेड़ा थाना में दर्ज कांड 138/23 के मामले में डीजीपी के निर्देश पर मिथिला क्षेत्र के डीआईजी ने कांडों की समीक्षा को लेकर बैठक बुलाई , इस दौरान बेनीपुर के एसडीपीओ ,सदर एसडीपीओ ,बहेड़ा थाना के थानाध्यक्ष समेत इस कांड के आरोपी अधिवक्ता भी मौजूद थे।
मंगलवार को डीआईजी स्वप्ना गौतम मेश्राम ने कांड के आरोपी अधिवक्ता को बुलाकर उनके पक्ष को भी जानने का प्रयास किया,और ऐसा पहली बार अधिवक्ता के साथ हुआ हें।
इससे पूर्व कई बार इस कांड के आरोपी अधिवक्ता ने तात्कालीन आईजी /डीआईजी को पत्र देते हुये कांडों की समीक्षा को लेकर आग्रह किया था लेकिन हर बार तात्कालीन डीआईजी /आईजी कांडों की समीक्षा नहीं कर अधिवक्ता के आवेदन को एसएसपी ,एसएसपी द्वारा उस आवेदन को ग्रामीण एसपी ,ग्रामीण एसपी फिर उस आवेदन को डीएसपी और डीएसपी उस आवेदन को थानाध्यक्ष के पास अग्रसारित कर देते थे और मामला जस का तस ?
कई महीने इस तरह बीत जाने के बाद डीजीपी विनय कुमार के निर्देश पर डीआईजी ने इस कांड के समीक्षा के लिये बैठक की तिथि तय की और आरोपी अधिवक्ता का भी पक्ष जाना।
आरोपी अधिवक्ता ने कहा कि कांड संख्या 138/23में मैं 52दिनों तक जेल में रहा ,इसका जिम्मेदार कौन हें ?मैंने कोई आपराधिक वारदात नहीं किया ,कोई घटना नहीं घटी,कोई आपराधिक चरित्र नहीं हें ,ना में कोई आतंकवादी था ना ही कोई अपराधी ,मैं भूमाफिया भी नहीं हूं।पहले मुझे पकड़ा गया फिर प्राथमिकी दर्ज हुई।मेरा कुसूर आखिर क्या था।
26मार्च 23 की तिथि में यानि गिरफ्तारी के एक दिन पहले की तिथि में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की और 27मार्च की तिथि में गिरफ्तारी हो गई और में 52दिन जेल में रहा।इसके अलावे अधिवक्ता सुशील चौधरी ने कहा कि में बुद्धिजीवी वर्ग से आता हूं ,पेशे से अधिवक्ता हूं लेकिन तात्कालीन डीएसपी ने बिना किसी साक्ष्य और बिना ठोस सबूत के यह कहते हुये पर्यवेक्षण टिप्पणी निकाल दिया कि दोनों पक्ष घटना के दिन न्यायालय परिसर में थे और कांड को सत्य करार दे दिया।सीसीटीवी का फुटेज भी उन्होंने अवलोकन किया था लेकिन कोई साक्ष्य नहीं मिला था।अधिवक्ता ने स्पष्ट कहा कि तत्कालीन एसएसपी के मार्गदर्शन में इस कांड की पटकथा लिखी गई ,और उनके इशारे पर सभी पात्र काम करने लगे ,लेकिन सवाल उठता हें कि एसएसपी किनके इशारे पर ऐसी घिनौनी घटना को अंजाम दिये , यह वहीं बता सकते हें?
मजेदार बात इस कांड में यह हें कि 27 मार्च को अधिवक्ता श्री चौधरी की गिरफ़्तारी होती है और एक दिन पहले की तिथि मे यानि 26 मार्च को प्राथमिकी दर्ज की जाती है और वह दिन रविवार होता है। रविवार के दिन कोर्ट बंद रहता है और अनुसंधानकर्ता कैसे कागजी खानापूर्ति बिना घटनास्थल पर गये कर दिया यह तों आश्चर्य से भी बड़ा आश्चर्य हें ? वरीय पुलिस पदाधिकारी के इशारे पर सूचक एवं दो अधिवक्ता का बयान थाना पर बैठाकर कांड दैनिकी मे लिख डालते है।
श्री चौधरी के पास मेन गेट का चाभी था क्योंकि श्री चौधरी उस समय बेनीपुर बार एसोसिएशन के महासचिव थे ,अनुसंधानक ने वैसे दो अधिवक्ता का बयान लिया है जिसके विरुद्ध श्री चौधरी ने महासचिव के हैसियत से अनुशासनात्मक कारवाई किया था मतलब अधिवक्ता सुशील चौधरी के विरोधी पक्ष थे।
अधिवक्ता ने कहा कि इस पूरे प्रकरण और बाद में हुये अन्य कांडों में बेनीपुर के तात्कालीन/वर्तमान एसडीपीओ समेत दरभंगा सदर एसडीपीओ की भूमिका संदिग्ध हें।अधिवक्ता ने कहा कि मेडम आप पर विश्वास हें ,सारे पर्यवेक्षण रिपोर्ट आपके पास हें अगर उस प्रतिवेदन को ठीक से अवलोकन किया जाएगा तों रहस्यों से पर्दा उठ जाएगा।
यहां बता दे कि बहेड़ा थाना में दर्ज यह कांड एक खोफनाक कहानी हें ,जिसे लेकर एक सीरियल या फिल्म भी बनाया जा सकता हें ,वजह यही हें कि जिले के एक वरीय पुलिस की कार्यशैली अगर इस तरह की होती हें तों पूरा पुलिस महकमे से आम आदमी का विश्वास उठ जाता हें।
लेकिन दूसरी तरफ सच्चाई भी यह हें कि अगर जिद्दी इंसान अगर जिद पर खड़ा हो जाय तों थानाध्यक्ष से लेकर डीजीपी तक अपनी गुहार लगाते लगाते उसे कहीं ना कहीं से न्याय जरूर मिल जाता हें और इस कांड में यही उम्मीद अधिवक्ता सुशील चौधरी को डीआईजी से हें।अधिवक्ता श्री चौधरी का स्पष्ट कहना हें कि डीजीपी विनय कुमार के रहते न्याय उन्हें जरूर मिलेगा यही नहीं दोषी पदाधिकारियों पर कारवाई भी होगी।
बहेड़ा थाना में दर्ज कांड (138/23 )किसी खौफनाक कहानी से कम नहीं ,प्राथमिकी के कुछ घंटे बाद ही हुई थी अधिवक्ता की गिरफ्तारी ,अधिवक्ता ने कहा मैं कोई कुख्यात अपराधी नहीं ,आतंकवादी नहीं ,भू माफिया नहीं फिर एक दिन में ही कैसे हो गई गिरफ्तारी।अधिवक्ता ने कहा कि डीआईजी के व्यवहार से लगता हें कि अब मुझे जरूर मिलेगा न्याय ?
सासाराम फायरिंग केस में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति का कड़ा रुख ,एक सप्ताह के भीतर डीएसपी और उसके बॉडीगार्ड को करे गिरफ्तार ,न्यायमूर्ति ने डीजीपी को दिया निर्देश।