डीजीपी से गुहार :सर दर दर भटका हूं ,मुझे न्याय नहीं मिला हें , मुझे न्याय चाहिये ,बिना कुसूर के 52दिनों तक जेल में बंद रहा हूं सर इसके जिम्मेदार कौन ?

डीजीपी से अधिवक्ता ने कहा सर ,पहले मेरी गिरफ्तारी हुई ,फिर एक दिन पहले के तिथि में प्राथमिकी हुई।

दस्तक 7मीडिया /संजय कुमार राय 

दरभंगा के पुलिसिंग में तात्कालीन एसएसपी अवकाश कुमार के कई किस्से हें ,जिसमें एक किस्सा यह भी हें कि बिना कुसूर के एक अधिवक्ता पर उन्होंने प्राथमिकी दर्ज करायी और प्राथमिकी दर्ज होने से पहले उसे गिरफ्तार कराया और गिरफ्तार होने के एक दिन पहले के तिथि से प्राथमिकी दर्ज कराया और उसे जेल भेजवा दिया।इसका नतीजा यह हुआ कि बिना कुसूर के 52दिनों तक वह अधिवक्ता जेल की सजा काटी।

अब सवाल यही हें कि इस 52दिनों के जेल यात्रा का आखिर जिम्मेदार कौन ??एसएसपी या डीएसपी या फिर थानेदार या फिर कोई और भी ?

अगर यह भी मान लिया जाय कि 26मार्च 23को बहेड़ा थाना में प्राथमिकी दर्ज हुयी और 27मार्च को बेनीपुर न्यायालय के अधिवक्ता सुशील कुमार चौधरी की गिरफ्तारी हुई ,तों एक अधिवक्ता के गिरफ्तारी में पुलिस ने इतनी जल्दीबाजी क्यूँ दिखाई ?अधिवक्ता श्री चौधरी ना ही शराब माफिया थे ,ना ही भूमाफिया थे और ना ही कोई इससे पहले उनपर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे जिसमें वह फरार चल रहें थे ,सवाल तों सटीक हें कि आखिर अधिवक्ता श्री चौधरी के गिरफ्तारी में इतनी जल्दीबाजी पुलिस ने  क्यूँ दिखाई?

इस घटना के कई और बिंदु -बार चर्चाएं हें लेकिन पुलिस के इस मंशा को विभाग की पुलिस भी नहीं समझ पायी और ना ही आम जनता समझ पायी हें। मजेदार बात यह भी हें कि जेल से छूटने के बाद कई बार अधिवक्ता ने एसएसपी /डीआईजी से न्याय की मांग की हें। तात्कालीन कई आईजी /डीआईजी ने इस मामले में अधिवक्ता को भरोसा दिलाया और कहा कि इस मामले की समीक्षा करेंगे लेकिन खबर लिखे जाने तक इन कांडों में समीक्षा नहीं हुई हें ,हाँ डीआईजी के यहां से आवेदन के आलोक में निकले प्रतिवेदन एसएसपी ,डीएसपी और थानेदार तक जरूर घूमता रहा लेकिन अधिवक्ता को न्याय नहीं मिला।अधिवक्ता सिर्फ इतना जानने का प्रयास कर रहें हें कि तत्कालीन एसएसपी अवकाश कुमार का यह खौफनाक कदम उनकी और कैसे बढ़ा ,किन कारणों से बढ़ा ?ना जान ,ना पहचान ,ना कोई दुश्मनी ?अधिवक्ता श्री चौधरी ने तात्कालीन एसपी अवकाश कुमार समेत तत्कालीन  डीएसपी डॉ सुमित कुमार पर इसके अलावे भी कई आरोप लगाए हें।लेकिन अब अधिवक्ता श्री चौधरी को विश्वास हें कि उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।

अधिवक्ता ने डीजीपी से लगाई न्याय की गुहार 

अधिवक्ता श्री चौधरी ने उनसे जुड़े तीन मामले को लेकर डीजीपी को पत्र दिया हें और न्याय की गुहार लगायी हें। डीजीपी ने अधिवक्ता सुशील चौधरी को भरोसा दिलाया हें कि डीआईजी दरभंगा को इन सभी मामलों में समीक्षा करने का निर्देश दिया जा रहा हें अगर समीक्षा के उपरांत भी यदि आवश्यकता महसूस होगी तों सभी कांडों में अग्रेतर अनुसंधान की कारवाई की जाएगी। डीजीपी के इस आश्वासन के बाद अधिवक्ता को अब भरोसा हो रहा हें कि उसके साथ न्याय अब जरूर होगा।
यहां बता दे कि अचानक बहेड़ा थाना में एक मामला (138/23)दर्ज हुआ ,जिसमें अधिवक्ता पर आरोप लगाया गया कि हरिजन महिला का उन्होंने कपड़ा फाड़ा ,गाली गलौज किया,इस आरोप के लगते ही गिरफ्तारी हो गई। अधिवक्ता श्री चौधरी का सीधा आरोप हें कि तात्कालीन एसएसपी ने प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही उन्हें  गिरफ्तार कराया और लहेरियासराय थाने पर रखा ,फिर बहेड़ा थाना में प्राथमिकी दर्ज कराया  और जेल भेजवा दिया।

अधिवक्ता के जेल जाने के बाद तात्कालीन बेनीपुर के डीएसपी डॉ सुमित कुमार ने जो पर्यवेक्षण प्रतिवेदन निकाला वह हास्यास्पद हें ?उन्होंने अपने प्रतिवेदन में लिखा कि इस कांड के आलोक में बेनीपुर के माननीय न्यायालय में लगे सीसीटीवी फुटेज का अवलोकन किया और पाया गया कि इस कांड के वादी और प्रतिवादी को न्यायालय परिसर में घटना के दिन देखा गया हें।वहीं जिस पीड़िता ने प्राथमिकी दर्ज कराया उसके बारे में डीएसपी ने कोई चर्चा ही नहीं किया हें कि वास्तव में उसके साथ घटना घटी हें अथवा नहीं  और कांड को सत्य करार दे दिया गया। उक्त सीसीटीवी में पीड़िता से छेड़छाड़ का  फुटेज भी होना चाहिये लेकिन सीसीटीवी में ऐसा कोई भी फुटेज नहीं हें,दरअसल ऐसी किसी घटना का फुटेज सीसीटीवी में डीएसपी को नहीं मिला , चूंकि अधिवक्ता बेनीपुर न्यायालय में प्रेक्टिस करते हें तों जाहिर सी बात हें कि वह न्यायालय में उपस्थित होंगे ,और इसी को आधार मानकर अधिवक्ता श्री चौधरी का उपस्थिति न्यायालय परिसर में दिखाकर तत्कालीन डीएसपी ने  मामले को सत्य करार दे दिया।
इसके बाद बहेड़ा थाना में 6फरवरी 24को एक अधिवक्ता ने मामला (31/24)हरिजन उत्पीड़न से संबंधित दर्ज कराया जिसमें दो लोंगों के नामजद होने की बात हें।तात्कालीन डीएसपी ने इस मामले में जल्दीबाजी नहीं दिखाई ,ना ही किसी को गिरफ्तार किया ,जिस तरह अधिवक्ता सुशील कुमार चौधरी के गिरफ्तारी में जल्दबाजी की थी। बल्कि इस प्राथमिकी के दर्ज होने के महज तीन दिन बाद बहेड़ा थाना में एक और प्राथमिकी( 34/24)दिनांक 8फरवरी 24को दर्ज हुई।
मजेदार बात यह हें कि बहेड़ा थाना में दर्ज दोनों कांड क्रमशः 31/24और 34/24का तात्कालीन डीएसपी ने जो पर्यवेक्षण टिप्पणी निकाला वह भी  हास्यास्पद हें। कांड संख्या 31/24के जो दो अधिवक्ता आरोपी हें उनके द्वारा दिये आवेदन को ही पूरा पर्यवेक्षण टिप्पणी में उतार दिया गया हें और निष्कर्ष निकाल दिया गया हें जबकि वादी पक्ष के आवेदन का कहीं भी चर्चा नहीं हें।
ऐसा प्रतीत होता हें कि अधिवक्ता सुशील चौधरी पर हुये प्राथमिकी 138/23में गवाह को बचाने के लिये बेनीपुर एसडीपीओ ने कोई कसर नहीं छोड़ी और तीनों मामले को एक दूसरे से जोड़कर झूठे गवाह ,झूठी प्राथमिकी करने वाले लोंगों को एक साजिश के तहत बचाया  और इसका शिकार सुशील कुमार चौधरी बनतें चले गये और जाहिर सी बात हें कि विगत कई वर्षों से डीएसपी और एसपी अपने पर्यवेक्षण टिप्पणी से पहले किसी भी घटना स्थल पर नहीं जाते हें और बंद कमरों में पूरा निष्कर्ष निकाल देते हें ,सच्चे को झूठा और झूठे को सच्चा बनाने में इन्हें देर नहीं लगता और डीएसपी के प्रतिवेदन को ही एसएसपी /एसपी भी सत्य करार दे देते हें इस कारण पीड़ित व्यक्ति को न्याय नहीं मिलता हें और वह न्याय के लिये दर्जनों बार एसपी /एसएसपी /डीआईजी /आईजी के कार्यालय का चक्कर लगाता हें। न्याय तों मिलता नहीं हाँ बहुत ज्यादा परेशानी पीड़ित व्यक्ति को जरूर होना पड़ता हें। लेकिन अब डीजीपी ने इस मामले को संज्ञान में ले लिया हें और अधिवक्ता श्री चौधरी को उम्मीद हें कि दूध का दूध पानी का पानी जरूर होगा।